
Shri Krishna Rukmani Story Lord Shri Krishna Death Story Krishna Puja
जयपुर. रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी थीं। महाभारत में उल्लेख है कि रुक्मिणी बहुत सुंदर और सर्वगुण संपन्न थीं। उन्हें लक्ष्मीस्वरूपा भी कहा गया है। रुक्मिणी का विवाह विशेष परिस्थितियों में हुआ था। श्रीकृष्ण को रुक्मिणी से विवाह करने के लिए उनका अपहरण करना पड़ा था। ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई बताते हैं कि श्रीमद्भागवत गीता में इस विवाह का अनूठा वर्णन मिलता है।
रुक्मिणी को श्रीकृष्ण से अगाध प्यार था और वे रोज सुबह उठकर श्रीकृष्ण की वंदना करती थीं। श्रीकृष्ण की एक अन्य पटरानी सत्यभामा रुक्मिणी से जलती थीं। श्रीकृष्ण को भी इसका भान था। उन्होंने एक लीला रची. सत्यभामा के पुण्यक व्रत में पुरोहित बने नारद ने सत्यभामा से दान में श्रीकृष्ण को मांग लिया। बाद में नारदजी ने श्रीकृष्ण के वजन के बराबर स्वर्ण तोलने की बात कही।
सत्यभामा ने एक-एक कर अपने सारे गहने तराजू के पलड़े में रख दिए, इसके बाद भी श्रीकृष्ण का पलड़ा भारी ही रहता है। यह देखकर रुक्मिणी सत्यभामा से कहती हैं कि प्रभु स्वर्ण के नहीं प्रेम और भक्ति के भूखे हैं। वे एक तुलसी सत्यभामा को देती हैं। तुलसी का पत्ता रखते ही कृष्णजी का पलड़ा हल्का होता है। सत्यभामा को समझ आ जाता है कि रुक्मिणी श्रीकृष्ण को सच्चा प्रेम करतीं हैं।
रुक्मिणी ने साबित किया कि सच्चा प्रेम ही सत्य है। श्रीकृष्ण-रुक्मिणी के अनके पुत्र हुए जिनमें चारुदेष्ण, सुदेष्ण, चारुदेह, सुचारू, चरुगुप्त, भद्रचारू, चारुचंद्र, विचारू, चारू और प्रद्युम्न। प्रद्युम्न पिछले जन्म में कामदेव थे जिनको शिवजी ने भस्म कर दिया था। बाद में रति की गुहार लगाने पर कामदेव को श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया था।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के परमधाम चले जाने के बाद रुक्मिणी उनका वियोग नहीं सह सकीं. श्रीकृष्ण की आठ रानियों में से सत्यभामा तथा अन्य देवियां ने तपस्या करने का निश्चय कर वन में जाने का निर्णय ले लिया था। इधर एक अन्य रानी जाम्बवंती के साथ रुक्मिणी ने सती होने का निश्चय कर लिया। जाम्बवंती के साथ रुक्मिणी ने अग्नि में प्रवेश कर लिया।
Published on:
05 Jan 2021 05:06 pm
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