
देवेंद्र सिंह/जयपुर। गोपालजी महाराज की हेड़े की परिक्रमा में श्रीराधा-गोपालजी के स्वरूप 170 साल पुरानी सोने का काम की हुई रत्न जडि़त पारचे की पोशाक धारण कर नगर भ्रमण पर निकलेंगे। इन स्वरूपों के साथ राधाजी की प्रिय सखियां ललिता और विशाखा के स्वरूप साथ चलेंगे। इससे भी खास बात स्वरूपों से जुड़ी है वह है गोपालजी के हेडे की परिक्रमा में चारों स्वरूप तीस किलो वजनी पोशाक धारण करते हैं। इसमें एक पोशाक का वजन 8 किलो करीब है, जिस पर पारचे का गोल्डन वर्क किया हुआ है।
198 साल पहले शुरू हुई
श्री गोपालजी महाराज की परंपरगत तरीके से निकलने वाली हेड़े की परिक्रमा छोटी काशी के बाशिंदों के लिए काफी मायने रखती है। करीब 198 साल पहले संवत् 1876 में अग्रवाल समाज के लोगों ने गोपालजी का मंदिर बनाकर गोपालजी की नगर परिक्रमा निकालना शुरू किया था। उस समय महाराजा जयसिंह स्वरूपों के दर्शन करने के लिए त्रिपोलिया गेट पर आते थे और स्वरूपों की आरती के बाद भगवान के सोने की गिन्नी भेंट करते थे। महाराजा ने परिक्रमा से प्रभावित होकर इस जयपुर की विरासत की उपाधि प्रदान की।
198 साल से बनते राधा-गोपालजी के स्वरूप
आयोजन से जुड़े राजेंद्र कुमार झरोखेवाले ने बताया कि आज से 198 साल पहले झरोखावाला, ठेडक्या व लालानी परिवार के लोगों ने परिक्रमा की शुरुआत की थी। इस परिक्रमा से अग्रवाल समाज के लोग बड़ी संख्या में जुड़े हुए हैं। परिक्रमा में घाट की गुणी स्थित फतेहचंद्रमाजी के मंदिर से स्वरूपों की झांकी को कड़ी सुरक्षा के साथ निकाले जाते हैं। पहले राज दरबार की ओर से कड़ी सुरक्षा की व्यवस्था की जाती थी और अब सरकार करती है। झांकी के साथ घुड़सवार पुलिस के जवानों के अलावा सशस्त्र पुलिस बल व पांच थानों का जाप्ता सुरक्षा में लगता है। शाम 4 बजे रवाना होकर स्वरूपों की झांकी सांगानेरी गेट पहुंचती है, जहां से शोभायात्रा के साथ रात 10 बजे मंदिर पहुंचती है।
मार्ग के अनुरूप होता है पदों का गायन
आयोजन से जुड़े कुंजबिहारी धोतीवाला ने बताया कि परिक्रमा में समाज के पांच साल के बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक धोती, कुर्ता और मोतिया रंग की पगड़ी पहने हुए ढोलक व मजीरों के साथ भक्त मंडली के सदस्य भजन-कीर्तन करते हुए नंगे पांव परिक्रमा में चलते हैं। इस दौरान पूरा वातावरण दीज्यो परिक्रमा श्री गोपाल की भादो सुदी छठ न..., संवत् 18 सै तन्यो जी, 76 की छह साल, हुई परिक्रमा शहर की र, काई कृपा करी गोपालजी... जैसे पदों के गायन से गूंज उठता है। इसमें बुजुर्गों व संतों के स्वयं रचित पदों का गायन किया जाता है। खास बात यह कि पदों की रचना मार्ग के अनुसार की गई और इसका गायन उसी के अनुरूप होता है। परिक्रमा ढोलकी का विशेष महत्व है। पुरानी परंपरा के अनुसार पंचमी के दिन शाम को गोपालजी का रास्ता स्थित गोपालजी के मंदिर में चांदी की ढोलक का पूजन होता है। परिक्रमा में ढोलक समाज के प्रमुख व्यक्ति के बांधी जाती है। पहले फूलचंद धोतीवाला, उनके बाद गोविंदनारायण धोतीवाला और वर्तमान में उनके पुत्र कुंजबिहारी धोतीवाला ढोलकी बांध रहे हैं। खास बात यह कि यह ढोलकी साल में केवल इसी दिन बजती है। पुराने समय में पंचमी के दिन हेड़े की परिक्रमा में शामिल होने के लिए प्रत्येक चौकड़ी पर दरबार की तरफ से हेला पड़ता था।
Published on:
26 Aug 2017 11:24 am
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