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Rajasthan: निकाय चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश…राज्य निर्वाचन आयोग चाहे तो 5 साल पूरे होते ही करा सकता है चुनाव

Rajasthan Local Body Elections: राजस्थान में नगरीय निकायों और पंचायतों के चुनाव लगातार टलने से संवैधानिक सवाल खड़े हो रहे हैं। अधिकांश नगर पालिकाओं का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और प्रशासक बने अधिकारियों से काम कराया जा रहा है।

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सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर

Rajasthan Local Body Elections: राजस्थान में नगरीय निकायों और पंचायतों के चुनाव लगातार टलने से संवैधानिक सवाल खड़े हो रहे हैं। अधिकांश नगर पालिकाओं का कार्यकाल समाप्त हो चुका है और प्रशासक बने अधिकारियों से काम कराया जा रहा है। जबकि सभी ग्राम पंचायतों का कार्यकाल खत्म होने पर सरपंचों को ही जिम्मेदारी सौंपी दी गई है, वहीं पंचायत समिति व जिला परिषदों में कार्यकाल खत्म होने पर अधिकारियों को प्रशासक लगाकर काम कराया जा रहा है।

खास बात यह है कि चुनाव आयोग ओबीसी आयोग की रिपोर्ट नहीं मिलने का हवाला दे रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट सुरेश महाजन बनाम मध्य प्रदेश सरकार के एक फैसले में यह भी व्यवस्था दे चुका है कि यदि ओबीसी आयोग की रिपोर्ट नहीं आए तो भी राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव करा सकता है।

संविधान ने आयोग को दिए अधिकार

चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग की है, जो अनुच्छेद 243के (पंचायत) और अनुच्छेद 243जेडए (नगरीय निकाय) के तहत स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। चुनाव की अधिसूचना जारी करने, कार्यक्रम तय करने और पूरी प्रक्रिया संचालित करने का अधिकार आयोग के पास है। ऐसे में सवाल यह है कि जब सरकार चुनाव कराने में देरी कर रही है, तो क्या राज्य निर्वाचन आयोग अपने स्तर पर चुनाव करा सकता है?

कोर्टः सरकार की देरी को नहीं बना सकते आधार

सुप्रीम कोर्ट ने किशनसिंह तोमर बनाम म्यूनिसिपल काॅर्पोरेशन ऑफ अहमदाबाद (2006) में स्पष्ट कहा था कि स्थानीय निकायों के चुनाव समय पर कराना अनिवार्य है और राज्य सरकार की देरी को इसका आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि राज्य निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र रूप से अपने अधिकारों का उपयोग करना चाहिए।

व्यावहारिक स्तर पर कुछ बाधाएं भी

हालांकि व्यावहारिक स्तर पर कुछ बाधाएं भी सामने आती हैं। नगर निकायों में वार्ड परिसीमन और आरक्षण निर्धारण जैसे कार्य राज्य सरकार के अधीन होते हैं। यदि ये प्रक्रियाएं लंबित रहती हैं, तो चुनाव कार्यक्रम घोषित करना कठिन हो जाता है। इसके बावजूद पंचायत चुनावों के संदर्भ में स्थिति अपेक्षाकृत अलग है, क्योंकि पंचायतों की मतदाता सूची का कार्य लगभग पूरा हो चुका है।

हाईकोर्ट ने कहा, निर्वाचन आयोग आंख नहीं मूंद सकता

हाईकोर्ट की एकलपीठ 20 सितंबर, 2025 को कह चुकी है कि निर्वाचन आयोग चुनाव में देरी पर आंख बंद करके नहीं बैठ सकता। यदि समय पर चुनाव कराने की संवैधानिक बाध्यता पूरी नहीं होती है तो राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव की प्रक्रिया को आगे बढ़ाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को बहाल करे।
हालांकि हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस आदेश पर रोक लगाकर सरकार को राहत दे दी, लेकिन हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 14 नवम्बर, 25 को 31 दिसंबर 2025 तक परिसीमन की प्रक्रिया पूरी करने व 15 अप्रेल, 2026 तक चुनाव कराने का आदेश दिया। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।

आयोग का कार्यकाल ही 31 तक, कैसे आएगी रिपोर्ट

पंचायत-निकाय चुनाव में ओबीसी आरक्षण को लेकर गठित आयोग का कार्यकाल 31 मार्च तक ही है, ऐसे में आयोग की रिपोर्ट को लेकर सवाल उठना शुरू हो गए हैं। आयोग सरकार को चिट्ठी लिखकर स्पष्ट कर चुका है कि करीब 400 ग्राम पंचायतों के आंकड़े मिसमैच हैं और वे मिल नहीं पा रहे। ऐसे में आयोग सर्वे कराने के रास्ते पर जा सकता है, लेकिन उसमें समय लगना तय है और आयोग का कार्यकाल ही 31 तक है।

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