
राज कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक - केरल से केरलम नामकरण वाले खूबसूरत दक्षिण भारतीय राज्य की सत्ता राजनीति वामपंथी एलडीएफ और कांग्रेसनीत यूडीएफ के बीच ही बंटी रही है। उच्च साक्षरता दर वाले केरलम ने हर चुनाव में सरकार बदल देने की अपनी परंपरा पिछली बार तोड़ दी। 140 सदस्यीय विधानसभा में एलडीएफ ने 99 सीटों के साथ शानदार जीत हासिल की। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की सत्ता से बेदखल हो चुके वाम दलों के लिए 2021 का वह चुनाव परिणाम किसी संजीवनी से कम नहीं था। कांग्रेस के शाश्वत अंतर्कलह के अलावा मुख्यमंत्री पिनरई विजयन के कामकाज का भी एलडीएफ को चुनावी लाभ मिला। एलडीएफ की जीत इस मायने में और भी खास रही कि उसने न सिर्फ हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन की परंपरा तोड़ दी, बल्कि सत्ता विरोधी भावना की अवधारणा को खारिज करते हुए 2016 के चुनाव से ज्यादा सीटें जीतीं। एलडीएफ का मत प्रतिशत भी 2016 के 43.35 से बढ़कर 45.28 प्रतिशत हो गया। भाजपानीत राजग पिछले चुनाव में अपनी एकमात्र सीट नेमोम भी गवां बैठा। उसका मत प्रतिशत भी गिरकर 12.47 रह गया, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में पासा पूरी तरह पलट गया। 20 लोकसभा सीटों में से 18 यूडीएफ जीत गया। एलडीएफ के हिस्से एक ही सीट आई। भाजपानीत राजग भी एक सीट जीतने में सफल रहा। बाद में भाजपा तिरुअनंतपुरम में अपना मेयर भी बनाने में सफल रही, जहां से पूर्व राजनयिक शशि थरूर कांग्रेस सांसद हैं।
जाहिर है, हर चुनाव में मतदाताओं की कसौटी और मुद्दे अलग होते हैं। इसलिए एक चुनाव के परिणामों के आधार पर दूसरे चुनाव की बाबत अनुमान ज्यादा तर्कसंगत नहीं माने जाते, लेकिन उनसे दलों और गठबंधनों के प्रति मतदाताओं के रुझान का संकेत तो मिल ही जाता है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद केरलम में पिछले साल स्थानीय निकायों के चुनाव हुए, जिनमें कांग्रेस का मत प्रतिशत सबसे ज्यादा 29.17 रहा, जबकि सत्तारूढ़ एलडीएफ का मत प्रतिशत 27.16 ही रहा। भाजपा 14.76 प्रतिशत मत पाने में सफल रही। मत प्रतिशत बताता है कि राजग सत्ता का दावेदार भले ही न हो, पर अब वह केरलम की चुनावी राजनीति का तीसरा खिलाड़ी बन चुका है। बेशक नौ अप्रेल को होने वाले मतदान में सत्तारूढ़ एलडीएफ और विपक्षी यूडीएफ के बीच कड़े संघर्ष की संभावना है, जिसमें जहां-तहां राजग की मौजूदगी, चुनाव पूर्व दलबदल तथा एसआइआर में घटे-बढ़े वोट भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। मसलन, कोट्टाराकारा में वरिष्ठ माकपा नेता आइशा पोट्टी के कांग्रेस में शामिल हो जाने से राज्य के वित्त मंत्री के एन बालागोपाल की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। नेमोम सीट पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर निवर्तमान विधायक एवं मंत्री सिवानकुट्टी को कड़ी चुनौती दे रहे हैं। वट्टीयुरकावु में एलडीएफ के वी के प्रसांथ, यूडीएफ के मुरलीधरन और राजग की श्रीलेखा के बीच त्रिकोणीय मुकाबला है।
वैसे उत्तरी केरलम के मलाबर क्षेत्र में यूडीएफ की बढ़त रहती है, लेकिन सत्ता का फैसला आमतौर पर मध्य और दक्षिण क्षेत्र करते हैं। 26 प्रतिशत मुस्लिम और 18 प्रतिशत ईसाई मतदाताओं के मुकाबले केरलम में हिंदू मतदाताओं का प्रतिशत 56 है, पर शेष देश की तरह भाजपा यहां उनकी पहली पसंद अभी तक नहीं बन पाई है, लेकिन राजग को मिलने वाला मत प्रतिशत एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सत्ता की जंग में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। भ्रष्टाचार के आरोप-प्रत्यारोप तथा बेरोजगारी, महंगाई और खाड़ी देशों में प्रवासी भारतीयों पर इजरायल-अमरीका-ईरान युद्ध का प्रभाव जैसे चुनावी मुद्दे अपनी जगह हैं, लेकिन केरलम में मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए लोक लुभावन वादों में कोई भी दल या गठबंधन किसी से पीछे नहीं रहना चाहता।
वैसे एलडीएफ जीते या यूडीएफ, राष्ट्रीय राजनीति के नजरिये से सत्ता 'इंडिया' गठबंधन के ही पास रहेगी, लेकिन दलगत राजनीति की दृष्टि से यह चुनाव वामपंथ और कांग्रेस, दोनों के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। 83 साल के पिनरई विजयन जनादेश पाने में सफल रहे तो एलडीएफ की सत्ता में हैट्रिक होगी, वरना सत्ता राजनीति के मानचित्र से वामपंथ गायब हो जाएगा। अंतर्कलह से ग्रस्त कांग्रेस भी लगातार तीसरी चुनावी हार के बाद केरलम में भाजपा के विस्तार को शायद ही रोक पाए। वायनाड से पहले राहुल गांधी और अब प्रियंका गांधी के लोकसभा सांसद होने के चलते केरलम विधानसभा चुनाव में नेहरू-गांधी परिवार की प्रतिष्ठा भी दांव पर है।
Published on:
08 Apr 2026 03:36 pm
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