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राजस्थान में हथकढ़ दारू कर रही इन आदिवासियों का जीवन बरबाद, पढ़ें खास रिपोर्ट

राजस्थान में हथकढ़ दारू कर रही इन आदिवासियों का जीवन बरबाद, पढ़ें खास रिपोर्ट
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जयपुर

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rohit sharma

Oct 10, 2018

liquor

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अनंत मिश्रा की रिपोर्ट

जयपुर।

अरनिया की रहने वाली 50 साल की रमीला अपनी उम्र से २० साल अधिक ७० पार की लगने लगी हैं। लगे भी क्यों नही ? शादी होकर आई तो पति से सुख नहीं मिला। पति सारी कमाई में उड़ा देता। घर चलाने के लिए रमीला को मेहनत-मजदूरी करनी पड़ गई। लड़का हुआ तो उम्मीद बंधी की जवानी ना सही तो बुढ़ापा तो चैन से कटेगा, लेकिन बीस साल की उम्र में ही शराब के मामले में पिता को पीछे छोड़ दिया। मां ने बेटे की शादी कर दी, शायद जिम्मेदारियों का बोझ उसे सही रास्ते पर ला दे। लेकिन बेटे की लत नही सुधरी। सात-आठ साल बाद ही पत्नी बेटे को छोड़कर चली गई। तब से रमीला अपने तीन पोते-पोतियों का पेटे भरने के लिए इस उम्र में भी मजदूरी कर रही हैं। यह अकेले रमीला की नहीं, जनजाति बाहुल बांसवाड़ा जिले के अधिकांश आदिवासियों के घर-घर की कहानी हैं।

डूंगरपुर से बांसवाड़ा पहुंचा तो लगा आदिवासी इलाके में महिलाओं की बदलती जिन्दगी पर एक नजर डाल लेनी चाहिए। केंद्र और राज्य सरकार की बड़ी-बड़ी योजनाओं से अखिर उनके जीवन में कितना बदलाव आया। अपने सहयोगी वरुण भट्ट से चर्चा की तो वे ले गए गढ़ी विधानसभा क्षेत्र के अरनिया गांव।

जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर कहीं पक्की सड़क, कहीं कच्ची तो कही नहर किनारे पगडण्डी की राह पकड़ते पहुंच गए अरनिया गांव। गांव पहुंचने से पहले ही उठते शोर ने कौतुहल पैदा किया कि आखिर ऐसा क्या है अरनिया में। यहां समवेत स्वर में वागड़ी में दारू पी नी बईय्यर वीसी खाईग्या, सुर रूत थईग्या अर्थात (शराब पीकर पत्नी को बेच खा गए, बच्चे रोते रह गए।

गांव पहुंचा तो नजारा एकदम फिल्मी दृश्य जैसा नजर आया। डेढ़-दो सौ आदिवासी महिलाएं। हाथ में डंडे। खेतों में घुसकर शराब की भट्टियां तोड़ रही थी। घरों में छिपाई गई शराब सड़क पर फेंक रही थी। अपने तीन पोते-पोतियों के साथ रमीला भी महिलाओं के इसी झुण्ड में शामिल थी। अलग बुलाकर पूछा तो अपनी बोली (वागड़ी) में दिल के दर्द का रोना लेकर बैठ गई। कहने लगी शराब ने हमारी जिन्दगी नर्क बना दी है। सुबह चार बजे उठकर घर का काम करो, फिर मेहनत-मजदूरी, तब जाकर अपना और पोते-पोतियों का पेट भर पाता है। न पति का कभी सहारा मिला और न बेटे से आसरा।

बांसवाड़ा जिले के बांसवाड़ा, गढ़ी व घाटोल विधानसभा क्षेत्र के हजारों आदिवासियों की कहानी रमीला जैसी है। कमला बाई हो या उकड़ी। शराब इनके जीवन को तबाह कर रहा है। इसलिए पिछले दो माह से गांव-गांव में रैली-विरोध प्रदर्शन कर हथकड़ शराब के अवैध अड्डों को भी नष्ट कर रही हैं और प्रशासन-राजनेताओं से शराबबंदी की मांग को लेकर प्रदर्शन भी कर रही है।

सरकारी योजनाओं का लाभ आदिवासी क्षेत्रों में कितना हुआ? कनकू बाई से सवाल किया तो मुझ से ही पूछ बैठी। यही विकास हुआ है। गांव-गांव में हथकड़ शराब ने सुख-चैन छीन लिया है। कोई सुनता नही इसलिए यह रास्ता अपनाना पड़ा। जयपुर बैठकर बांसवाड़ा के मुद्दे कुछ अलग नजर आते है, लेकिन यहां आकर नजर डाली तो मुद्दे एकदम बदल जाते है। ताज्जुब की बात तो यह है कि दो माह से हजारों महिलाएं सामाजिक कुरीति के खिलाफ अलग तरीके का अभियान चला रही हैं, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं।
ऐसा नही कि शराबबंदी की मांग के अलावा यहां अन्य मुद्दे नहीं है। सात दशकों से बांसवाड़ा को रेल से जोडऩे के वादे किए जा रहे है, लेकिन चुनाव आते है, निकल जाते हैं, लेकिन काम है कि सर्वे और सरकारी फाइलों की कार्रवाई से आगे बढ़ ही नही पा रहा है। डूंगरपुर से बांसवाड़ा की 110 किलोमीटर की दूरी तय करने में रोडवेज की एक्सप्रेस बस को भी भी साढ़े तीन घंटे का समय लगता है। सड़कों की हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है।

चुनाव की घोषणा हो चुकी है। राजनीतिक दल जीत-हार के समीकरण टटोल रहे है। चुनावी सभाओं में राष्ट्रीय मुद्दे छाए हुए हैं, लेकिन रमीला, कनकू बाई और उन जैसी हजारों महिलाओं के मुद्दे कब चुनावी मंचों से उछाले जाएंगे, कोई नहीं जानता। नेताओं को चिंता है तो बस अपनी कुर्सी और शराब से होने वाली कमाई की।

अवैध शराब पर महिलाओं का धावा: आदिवासी बहुल बांसवाड़ा जिले में पिछले कई दिन से महिलाओं ने अवैध शराब के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और वे समूह में एक के बाद एक अड्डे को तबाह करने में जुटी है। सोमवार को चार ट्रैक्टर में भरकर महिलाएं जिले की घलकिया पंचायत के अरनिया गांव पहुंच गई और घर घर और खेत खेत जाकर शराब और शराब बनाने की सामग्री नष्ट की। महिलाओं ने शराब छिपाने का एक एक ठिकाना खंगाला। खेत में शराब के ड्रम निकाल लाई तो घर की छतों व भूसे में छिपाकर रखी बीयर व शराब की बोतलें बरामद कर उन्हें नष्ट किया। पैरों से कुचलकर महुआ नष्ट किया। शराब बनाने के बर्तन अपने साथ उठा लाई।


कुल शराब की दुकानें

जिले में अधिकृत 22 कंपोजिट श्रेणी अंग्रेजी-देशी की दुकानें।
9 दुकानें अंग्रेजी शराब की बांसवाड़ा-कुशलगढ़ में। यहां ६ दुकानें देशी शराब की अधिकृत हैं।
हर थाना क्षेत्र में 10 से 15 अवैध ढाबे और खेत-नहर किनारे हथकढ़़
आबकारी विभाग का राजस्व लक्ष्य इस वर्ष-132 करोड़
पांच माह से महिलाएं शराबबंदी को लेकर कर रही विरोध प्रदर्शन
दो माह से लगातार गांव-गांव पहुंच महिलाएं अवैध शराब के अड्डों को तोड़ रही।