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त्रिपुरा सुंदरी मंदिर : आखिर क्यों बार-बार धोक लगाने आते हैं गहलोत-वसुंधरा? जानें 10 खासियतें-मान्यताएं

Tripura Sundari Temple in Banswara Rajasthan : आखिर क्यों बार-बार धोक लगाने आते हैं गहलोत-वसुंधरा? जानें सुने-अनसुने 10 खासियतें-मान्यताएं

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Tripura Sundari Temple in Banswara Rajasthan every thing to know

जयपुर।

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने रविवार को बांसवाड़ा स्थित त्रिपुरा सुंदरी मंदिर में पूजन कार्यक्रम में भाग लिया। सीएम गहलोत ने माता की पूजा-अर्चना कर प्रदेश की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की। इस अवसर पर जनजाति क्षेत्रीय विकास राज्यमंत्री अर्जुन सिंह बामनिया, समाजसेवी दिनेश खोड़निया सहित स्थानीय जनप्रतिनिधि मौजूद थे।

गौरतलब है कि त्रिपुरा सुंदरी मंदिर के साथ कई पौराणिक मान्यताएं और आस्था जुड़ी हुई है। सीएम गहलोत ही नहीं बल्कि पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के अलावा भी कई राजनेता बांसवाड़ा आने पर मां त्रिपुरा सुंदरी के दर्शन ज़रूर करते हैं। आइए जानते हैं त्रिपुरा सुंदरी मंदिर की 10 खासियतें, विशेषताएं, मान्यताएं।

त्रिपुरा सुंदरी मंदिर - 10 खासियतें/मान्यताएं


1. बांसवाड़ा से लगभग 14 किलोमीटर और तलवाड़ा ग्राम से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर सघन हरियाली के बीच प्रतिष्ठित हैं मां त्रिपुरा सुंदरी। कहा जाता है कि मंदिर के आस-पास पहले कभी शक्तिपुरी, शिवपुरी तथा विष्णुपुरी नाम के तीन दुर्ग हुआ करते थे। इन तीनों के बीच स्थित होने के कारण देवी का नाम त्रिपुरा सुन्दरी पड़ गया।


2. यह स्थान कितना प्राचीन है ये फिलहाल प्रमाणित नहीं है। वैसे देवी मां की पीठ का अस्तित्व यहां तीसरी सदी से पूर्व का माना गया है।


3. गुजरात, मालवा और मारवाड़ के शासक त्रिपुरा सुन्दरी के उपासक थे। गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह की यह इष्ट देवी रहीं। कहा जाता है कि मालव नरेश जगदेव परमार ने तो मां के श्री चरणों में अपना शीश ही काट कर अर्पित कर दिया था। उसी समय राजा सिद्धराज की प्रार्थना पर मां ने पुत्रवत जगदेव को पुनर्जीवित कर दिया था।


4. मंदिर का जीर्णोद्धार तीसरी शती के आस-पास पांचाल जाति के चांदा भाई लुहार ने करवाया था। मंदिर के समीप ही भागी (फटी) खदान है, जहां किसी समय लोहे की खदान हुआ करती थी। किंवदांती के अनुसार एक दिन त्रिपुरा सुंदरी भिखारिन के रूप में खदान के द्वार पर पहुंची, लेकिन पांचालों ने उस तरफ ध्यान नहीं दिया। देवी ने क्रोधवश खदान ध्वस्त कर दी, जिससे कई लोग काल के ग्रास बने। देवी मां को प्रसन्न करने के लिए पांचालों ने यहां मां का मंदिर तथा तालाब बनवाया। इस मंदिर का 16वीं शती में जीर्णोद्धार कराया गया। आज भी त्रिपुरा सुन्दरी मंदिर की देखभाल पांचाल समाज ही करता है।


5. बताया जाता है कि 1982 में खुदाई के दौरान यहां शिव पार्वती की मूर्ति निकली थी, जिसके दोनों तरफ रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश व कार्तिकेय भी हैं। प्रचलित पौराणिक कथानुसार दक्ष-यज्ञ तहस-नहस हो जाने के बाद शिवजी सती की मृत देह कंधे पर रख कर झूमने लगे। तब भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए योगमाया के सुदर्शन चक्र की सहायता से सती के शरीर को खण्ड-खण्ड कर भूतल पर गिराना आरम्भ किया। उस समय जिन-जिन स्थानों पर सती के अंग गिरे, वे सभी स्थल शक्तिपीठ बन गए। ऐसे 51 शक्तिपीठ हैं और उन्हीं में से एक शक्तिपीठ है त्रिपुरा सुंदरी।

6. त्रिपुर सुंदरी देवी मंदिर के गर्भगृह में देवी की विविध आयुध से युक्त अठारह भुजाओं वाली श्यामवर्णी भव्य तेजयुक्त आकर्षक मूर्ति है। इसके प्रभामण्डल में नौ-दस छोटी मूर्तियां है जिन्हें दस महाविद्या अथवा नव दुर्गा कहा जाता है। मूर्ति के नीचे के भाग के संगमरमर के काले और चमकीले पत्थर पर श्री यंत्र उत्कीर्ण है, जिसका अपना विशेष तांत्रिक महत्व हैं। जबकि मंदिर के पृष्ठ भाग में त्रिवेद, दक्षिण में काली तथा उत्तर में अष्ट भुजा सरस्वती मंदिर था, जिसके अवशेष आज भी विद्यमान है। यहां देवी के अनेक सिद्ध उपासकों व चमत्कारों की कथाएं सुनने को मिलती हैं।

7. मंदिर शताब्दियों से विशिष्ट शक्ति साधकों का प्रसिद्ध उपासना केन्द्र रहा है। इस शक्तिपीठ पर दूर-दूर से लोग आकर शीश झुकाते है। नवरात्रि पर्व पर मंदिर प्रांगण में प्रतिदिन विशेष कार्यक्रम होते है, जिन्हें विशेष समारोह के रूप में मनाया जाता है। नौ दिन तक प्रतिदिन त्रिपुरा सुंदरी की नित-नूतन श्रृंगार की मनोहारी झांकी बरबस मन मोह लेती है। चेत्र व वासन्ती नवरात्रि में भव्य मूर्ति के दर्शन प्राप्त करने दूरदराज से लोग आते हैं।

8. नवरात्रि की अष्टमी और नवमीं को यहां हवन होता है। नवमीं या दशहरे पर जवारों को माताजी पर चढ़ाते हैं। इसके बाद पूजा अर्चना करके इस कलश को जवारों सहित माही नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। विसर्जन स्थल पर पुनः एक मेला सा जुटता है, जहां त्रिपुरे माता की जय से समस्त वातावरण गूंज उठता है। अष्टमी पर यहां दर्शनार्थ पहुंचने वालों में राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली और महाराष्ट्र के भी लाखों श्रद्धालु शामिल होते है।

9. वाग्वरांचल में शक्ति उपासना की चिर परम्परा रही है। साढ़े ग्यारह स्वयं भू-शिवलिंगों के कारण लघु काशी कहलाने वाला यह वाग्वर प्रदेश शक्ति आराधना के कारण ब्राहाी, वैष्णवी और वाग्देवी नगरी के रूप में लब्ध प्रतिष्ठित है।

10. जगत जननी त्रिपुरा सुन्दरी शक्तिपीठ के कारण यहां की लोक सत्ता प्राणवंत, ऊर्जावान और शक्ति सम्पन्न है।