
सुरेश व्यास, जयपुर।
अमरीका का नाम आते ही जेहन में उतर आती है सात समंदर पार स्थित दुनिया के उस ताकतवर देश की तस्वीर, जो व्यापार से लेकर सुरक्षा के मसलों तक दुनिया के कई देशों को बरसों से प्रभावित करता रहा है। रूस के साथ अमरीका के शीतयुद्ध के काल में तो कई लोग अमरीका को दुनिया का चौधरी तक कह डालते थे।
अमरीका आज अपना स्थापना दिवस बना रहा है, लेकिन शायद अमरीका में रहने वाले लोगों को भी यह भान नहीं होगा कि राजस्थान के जोधपुर जिले में एक गांव ऐसा भी है, जिसे अमरीका के नाम से पुकारा और पहचाना जाता है। यह गांव हैं जोधपुर के फलोदी उपखंड में। नाम है लोर्डियां। लेकिन गांव के बाहर रहने वाले लोग आज भी सुबह सुबह गांव का यह असली नाम लेने के बजाय इस गांव को अमरीका या किसी अन्य नाम से ही पुकारना पसंद करते हैं।
चूंकि यह गांव फलोदी उपखंड का ही हिस्सा है, लेकिन फलोदी शहर में रहने वाले लोग भी इसे अमरीका या 'सामलो गांव' (सामने वाला गांव) ही कहते हैं। इसके पीछे बरसों पुरानी किवदंती है, जिस पर हम तो विश्वास नहीं करते, कि सुबह सुबह इस गांव का असली नाम ले लिया जाए तो दिन भर खाना नहीं मिलता।
देखने-पढ़ने में भले ही ये हास्यास्पद लगता है, लेकिन पूछने पर लोग उदाहरण तक गिना देते हैं कि अमुक आदमी ने नाम लिया तो उसे दिन भर रोटी नहीं मिली।
मुझे इस बात का अहसास करीब तीन दशक पहले हुआ। चूंकि गांव में रिश्तेदारी है। एक बार वहां जाने के लिए फलोदी बस स्टैंड की विंडो से लोर्डिया का टिकट मांगा, लेकिन बुकिंग क्लर्क ने जैसे अनसुना कर दिया। फिर पीछे खड़े किसी यात्री ने कहा कि अमरीका का टिकट मांगिए। मैंने जैसे ही कहा, एक टिकट अमरीका का देना तो मुस्कुराते हुए बुकिंग क्लर्क ने किराया लेकर टिकट थमा दिया। कारण पूछा तो कहा जिसने अमरीका बोलने की बात बताइए, उससे ही पूछ लीजिए। हम तो सुबह सुबह इस गांव का नाम नहीं लेते।
दरअसल, यह फलोदी उपखंड का एक प्रमुख गांव हैं। पहले तो अन्य गांवों की तरह यहां भी विकास नहीं था। पेयजल के लिए गांव के ही तालाब का आसरा था। इसका पानी भी लाल होता था। कहा जाता है इस गांव के लोग कदकाठी और ताकत के मामले में काफी मजबूत हुआ करते हैं। यहां का रहन-सहन और खानपान और मेहनत करने की आदत ने गांव के लोगों को इस विशेषता से नवाजा।
आजादी के आंदोलन में भी इस गांव के लोगों ने प्रमुखता से भूमिका निभाई। उस वक्त चूंकि कांग्रेस और साम्यवादी विचारधाराओं का प्रभाव था तो यह भी गांव के प्रमुख लोगों पर नजर आया। उस जमाने में गांव के दो प्रमुख स्वतंत्रता सैनानी हुए। हरिकिशन सरल और गोपीकिशन कठिन। इन दोनों के तखल्लुस में भी सरल और कठिन की कहानी आजादी आंदोलन के दौरान गरम दल और नरम दल से ही जुड़ी है। आज भी गांव के लोग इन दोनों को बड़े सम्मान के साथ याद करते हैं।
गांव मुख्य मार्ग पर स्थित एक विकसित गांव है। गांव में सीमेंट की सड़कें हैं। पेयजल के लिए उच्च जलाशय है। सिंचाई के पानी से खेत लहलहाते हैं। स्कूल है, अस्पताल है। छोटा-मोटा बाजार भी विकसित हो गया है। गांव के लोगों ने अपना बिजनैस आदि भी शुरू कर दिया है।
किसी जमाने में गांव के लोग रोजीरोटी के लिए मुंबई व अन्य शहरों में जाते थे और गांव में महिलाएं-बच्चे ही नजर आते थे, लेकिन अब यह स्थिति नहीं है। गांव के युवा सरकारी नौकरियों में भी है। लोर्डियां को अमरीका क्यूं कहते हैं, पूछने पर गांव के मूल निवासी शिक्षक अशोक पुरोहित मुस्कुरा कर रह जाते हैं और कहते हैं कि अब ये पुराने जमाने की बातें हो गई। अब लोर्डियां पिछड़ा गांव नहीं है। विकसित हो गया है। कोई हमारे गांव को अमरीका कहे तो खुशी ही होती है।
Updated on:
04 Jul 2018 03:28 pm
Published on:
04 Jul 2018 03:25 pm

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