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स्व. दुर्गादास राठौड़ की प्रतिमा का अनावरण करेंगे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, जानें राष्ट्रवीर की ‘गौरव गाथा’

आज वीर दुर्गादास राठौड़ की जयंती है।उनका जन्म 13 अगस्त 1638 को हुआ था। उन्हें पिता की तरह ही जोधपुर के राजा राव जसवंत सिंह ने अपना विशेष सैन्य दर्जा दिया था।

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Warrior Durgadas Rathore Life Career Stories statue in Jodhpur

जयपुर।

केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह आज एक दिवसीय राजस्थान दौरे पर रहेंगे। वे जोधपुर जिले के सालवा कला में राष्ट्रवीर दुर्गादास राठौड़ की 385 वीं जयंती एवं मूर्ति अनावरण कार्यक्रम में शामिल होंगे। इस दौरान केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सतीश पूनियां, आरएसएस के क्षेत्रीय प्रचारक निंबाराम, पाली सांसद पीपी चौधरी, भोपालगढ़ विधायक पुखराज गर्ग सहित स्थानीय जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक और आमजन मौजूद रहेंगे।

जानकारी के अनुसार रक्षा मंत्री वीर दुर्गादास राठौड़ की 12 फीट उंची पंच धातु मूर्ति का अनावरण करने के साथ ही सरहदी क्षेत्रों की सुरक्षा के संबंध में सैन्य अफसरों से चर्चा भी करेंगे।


जोधपुर को मुगलों से कराया था मुक्त

आज वीर दुर्गादास राठौड़ की जयंती है।उनका जन्म 13 अगस्त 1638 को हुआ था। उन्हें पिता की तरह ही जोधपुर के राजा राव जसवंत सिंह ने अपना विशेष सैन्य दर्जा दिया था। दुर्गादास राठौड़ ने ही जोधपुर को मुगलों से मुक्त करवाकर राव राजा जसवंत सिंह के पुत्र अजीत सिंह को गद्दी पर बैठाया था। उनका निधन 1718 में उज्जैन के पास क्षिप्रा नदी के तट पर हुआ था।

स्व. दुर्गादास राठौड़ - जीवन परिचय

- सूर्यवंशी राठौड़ कुल के राजपूत दुर्गादास राठौड़ का जन्म 13 अगस्त 1638 को और मृत्यु 22 नवम्बर 1718 को हुई थी।

- इस वीर राजपूत योद्धा ने मुगल शासक औरंगजेब को युद्ध में पराजित किया था। 17वीं सदी में मारवाड़ के शासक रहे जसवंत सिंह के निधन के बाद इस क्षेत्र में राठौड़ वंश को बनाये रखने का श्रेय उन्हें ही जाता है।

- उनके पिता आसकरण राठौड़ महाराजा जसवंत सिंह के मंत्री थे। उन्हें विशेष सैन्य का दर्ज़ा मिला हुआ था। मां का नाम नेतकँवर बाई था। दुर्गादास का पालन पोषण लुनावा नाम के गाँव में हुआ।

- मारवाड़ शासक जसवंत सिंह के निधन के बाद जब कोई उत्तराधिकारी घोषित नहीं हुआ तब औरंगजेब ने मौके का फायदा उठाते हुए मारवाड़ में अपना हस्तक्षेप जमाने का प्रयास किया। लेकिन मुग़ल रणनीति अपने मंसूबों पर सफल नहीं हो सकी। दुर्गादास उन लोगों में से थे, जिन्होंने कब्जा करने वाली ताकतों के खिलाफ अथक संघर्ष किया।

- जसवंत सिंह के निधन के बाद उनकी दो रानियों ने दो पुत्रों को जन्म दिया। इनमें से एक का जन्म के बाद ही निधन हो गया जबकि अन्य अजीत सिंह के रूप में उनका उत्तराधिकारी बना। फ़रवरी 1679 तक यह समाचार औरंगजेब तक पहुँचा, लेकिन उन्होंने बच्चे को वैध वारिस के रूप में मानने से मना कर दिया।

- दुर्गादास ने अपने कर्तव्यों को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद और जो वादा उन्होंने जसवंत सिंह को दिया था, उसे पूरा किया। जोधपुर छोड़ कर सदरी, उदयपुर, रामपुरा, भानपुरा में कुछ समय तक रहे और फिर पूजा करने के लिए छोड़ दिया महाकाल उज्जैन में।

- 22 नवंबर 1718 को शिप्रा के तट पर उज्जैन, दुर्गादास की 81 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई, लाल पत्थर में उनकी छतरी अभी भी चक्रतीर्थ, उज्जैन में है, जो सभी स्वतंत्रता सेनानियों और राजपूतों के लिए तीर्थ है।

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