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Watermelon Dispute Rajasthan: एक तरबूज से शुरू हुआ विवाद, दो रियासतों के बीच युद्ध तक पहुंचा, जानिए अनोखी तकरार

watermelon dispute Rajasthan: तरबूज के विवाद से नागौर-बीकानेर में बढ़ा संघर्ष, लोककथा और इतिहास का अनोखा उदाहरण माना जाता है।
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जयपुर

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Nikhil Parmar

•

Updated: 17 Apr 2026, 12:42 PM IST

Watermelon Dispute Rajasthan

मतीरे की राड़ Image Source: ChatGpt

Watermelon Dispute Rajasthan: राजस्थान के इतिहास में कई बड़े युद्ध दर्ज हैं, जिनके बारे में आपने सुना या पढ़ा हो। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी भी हैं जो अपने अनोखे कारणों के चलते आज तक चर्चा में बनी हुई हैं। ऐसी ही एक तकरार है जिसे 'मतीरे की राड़' कहा जाता है। जिसे स्थानीय इतिहास और लोककथाओं में खास जगह मिली है। बताया जाता है कि साल 1644 के आसपास नागौर और बीकानेर रियासतों की सीमाएं एक-दूसरे से सटी हुई थीं। बीकानेर की ओर अंतिम गांव खीलवा और नागौर की ओर जोखणिया गांव की सीमा आपस में मिलती थी। इसी सीमा पर दोनों गांवों के किसानों के खेत लगे हुए थे।

कैसे हुआ तरबूज को लेकर विवाद

बताया जाता है कि बीकानेर की तरफ के खेत में मतीरे (तरबूज) की एक बेल उगी। यह बेल धीरे-धीरे बढ़ते हुए बीकानेर की सीमा पार कर नागौर की सीमा में पहुंच गई और वहां एक तरबूज लग गया। यहीं से विवाद शुरू हुआ- बीकानेर का किसान कहता था कि बेल उसकी जमीन में है, इसलिए फल भी उसका है। वहीं नागौर के किसान का तर्क था कि बेल भले तुम्हारे खेत में हो लेकिन तरबूज उसके खेत में उगा है, इसलिए हक उसी का बनता है।

गांव से दरबार तक पहुंचा मामला

शुरुआत में यह बहस केवल दो किसानों के बीच थी, लेकिन धीरे-धीरे मामला दोनों गांवों के पंचों तक पहुंच गया। बात यहीं नहीं रुकी, बल्कि विवाद इतना बढ़ा कि इसकी सूचना नागौर के शासक अमर सिंह और बीकानेर के शासक कर्ण सिंह तक पहुंच गई। इस छोटे से विवाद ने दोनों रियासतों के बीच तनाव पैदा कर दिया। हालात ऐसे बने कि इसे लेकर टकराव हुआ, जिसे 'मतीरे की राड़' के नाम से जाना गया। कहा जाता है कि इस संघर्ष में दोनों पक्षों के सैनिक भी आमने-सामने आए और कुछ हताहत भी हुए। इतिहासकारों के अनुसार इस टकराव में अंततः बीकानेर के कर्ण सिंह का पक्ष मजबूत रहा और उन्हें विजयी माना गया।

आज भी जिंदा है कहावत

समय के साथ यह घटना एक कहावत में बदल गई। आज भी राजस्थान में जब किसी छोटी बात पर बड़ा झगड़ा हो जाता है, तो लोग कहते हैं- 'ये तो मतीरे की राड़ हो गई।' यह कहानी सिर्फ एक विवाद नहीं, बल्कि यह बताती है कि कैसे छोटी-सी बात भी अगर समय रहते सुलझाई न जाए, तो बड़ा रूप ले सकती है।