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क्या है कजली तीज का महत्व, जानिए इस खास दिन की रहस्यमय बातें

रात 8 बजकर 49 मिनट पर होगा चंद्रोदय, अर्घ्य अर्पित कर महिलाएं खोलेगी व्रत

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जयपुर

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Rajesh Dixit

Aug 22, 2024

जयपुर. भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया पर आज धृति योग योग में कजली तीज, सातुड़ी तीज, संकष्टी गणेश चतुर्थी मनाई जा रही है। वैदिक पंचांग के अनुसार कजरी तीज का पर्व भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन मनाया जाता है। भादवे की इस तीज को कजली तीज, सातूडी तीज और भादो तीज के नाम से भी जाना जाता है। विवाहित महिलाएं अखण्ड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रख रही हैं। आज तृतीया तिथि दोपहर 1:46 बजे तक है। इसके बाद चतुर्थी तिथि शुरू हो जाएगी।

इसलिए मनाते हैं पर्व

इस दिन माता पार्वती और भगवान शिव के साथ नीमड़ी माता की पूजा करने का विधान है। शास्त्रों के अनुसार मध्य भारत में कजली नाम का एक वन था। एक बार वहां के राजा की अकाल मृत्यु हो गई और इसके वियोग में रानी ने खुद को सती कर लिया। इस घटना से वहां के लोग इतने दुखी हो गए, लेकिन राजा-रानी के प्रेम से इतना प्रभावित हुए कि वे लोग कजली गीत गाने लगे थे। ये गीत पति-पत्नी के प्रेम का प्रतीक होता था। कजरी तीज मनाने की परंपरा यहीं से शुरू हुई।

किया चौथ माता का पूजन

वहीं आज संकष्टी चतुर्थी होने से महिलाएं पति की दीर्घायु, पुत्र और परिवार में सुख-समृद्धि के लिए निर्जला रहकर व्रत रख रही है। इस दौरान विभिन्न जगहों पर समूहों में महिलाएं व्रत रखकर गणेशजी, चौथ माता का पूजन कर कथा सुनी। चौथ का उद्यापन करने वाली महिलाएं 14 सुहागिनों को भोजन कराकर उपहार स्वरूप सुहाग की वस्तुएं भेंट करेंगी। वहीं रात को चंद्रोदय होने के बाद अघ्र्य अर्पित कर महिलाएं व्रत खोलेगी। चंद्रोदय रात 8 बजकर 49 मिनट पर होगा।

यहां किया टीजडी माता का व्रत

सिंधी समाज की महिलाओं ने यह पर्व सुहाग की लंबी उम्र की कामना के लिए टीजडी ( गौरी ) माता का व्रत रखा। महिलाएं भोर होने से पूर्व उठकर कोकी, मीठी मानी आदि बनाकर अल्पाहार किया। इसके बाद दिनभर निराहार रहकर उपवास रखेंगी ।दोपहर में ब्राह्मण के घर जा कर कथा सुनेंगी और टीजड़ी माता को हिंडोले (झूले) में झुलाएंगी। समाज के तुलसी संगतानी ने बताया कि धान्य रूप में माता की पूजा की जाती है, कुछ दिन पूर्व शुभ मुहूर्त में मिट्टी के पात्र में जवारों को बोया जाता है, और जवारे बड़े होने पर उनकी पूजा की जाती है। रात्रि चंद्रोदय होने पर महिलाएं सोलह शृंगार कर चंद्रमा को दूध और कुट्टी ( चूरमे ) का अर्घ्य देकर अखंड सौभाग्य का वर मांगेंगी। चंद्रमा के दर्शन करने के बाद अर्घ्य देकर ही महिलाएं भोजन करेंगी। पंडित जीतू महाराज ने बताया कि मां गौरी और भगवान शिव से पल्लव प्रार्थना कर अपने पति और परिवार की सुख समृद्धि की कामना की जाएगी। वहीं घर परिवार के बुजुर्गों के चरण छूकर आशीर्वाद लेंगी।