आलोक शर्मा/जयपुर। यह कलयुग है और भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा था कि इस युग में पाप बढ़ेगा। इन दिनों गीता में कही वे सभी बाते सार्थक होती नजर आ रही है। कि धर्मगुरू खुद पाप के सिंहासन पर बैठे हैं और जनता को सद् मार्ग पर आने का पाठ भी पढा रहे हैं। लेकिन क्या वास्तव में गलती सिर्फ इन गुरूओं की है? क्या उस जनता कि नहीं जो बाजार में जाकर हर वस्तु की जांच करती है कि क्या वो असली है या नकली? तो फिर इन धर्मगुरूओं पर क्यों जनता विश्वास कर उन्हें इस मुकाम पर पहुंचा देती है कि फिर भगवान और इन पाखंडियों के बीच कोई असमानता नहीं रह जाती।
बात सिर्फ वीआईपी रहन सहन कि नहीं है अब बात इन बाबाओं के चरित्र की है। जी हां, अगर अभी तक आपकी आंखे नहीं खुली हैं। तो एक फिर हम इन बाबाओं की कहानी आपके सामने रख रहे हैं। सबसे पहले हम बात करते हैं।
आसूमल यानि आसाराम बापू की गुजरात में पनपे इस बाबा के देश विदेश में अंध भक्त बनाए। आसूमल को गुरू मानकर भक्तों ने इस कलयुगी बाबा को भगवान बना दिया। लेकिन अपने भक्तों को सतमार्ग पर चलने की बात कहने वाले इन बाबा को सजा मिली तो उस जुर्म की। जो जुर्म की दुनिया में सबसे घिनौना जुर्म माना जाता है।
2013 में आसाराम पर राजस्थान के जोधपुर के समीप एक आश्रम में नाबालिग से दुष्कर्म का आरोप है और उसी जुर्म में आसराम अभी जोधपुर जेल में कैद है। वैसे, आसाराम पर सूरत की दो बहनों ने भी दुष्कर्म का मामला दर्ज करवा रखा है। उनका आरोप है कि आसाराम ने 2001 से 2006 तक यौन उत्पीडऩ किया। संत की छवि और सफेद कपड़े पहनने वाले आसराम पर खून के भी छींटे हैं। आसराम पर हत्या के भी आरोप हैं।
अब बात करते हैं डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत रामरहीम की। भक्तों का ये वीआईपी बाबा अपनी शानोशौकत से चर्चाओं में रहा। इस रंगीन बाबा ने अपनी फिल्म भी बना डाली। लेकिन अब जाकर इस दुष्कर्मी बाबा को 20 साल की कैद हो गई है। दुष्कर्म के आरोप में जेल में गुरमीत रामरहीम सजा काट रहा है, लेकिन जेल में भी वो अपनी मुहंबोली को साथ में रखने की मांग कर रहा है।
चाहे आसाराम हो, गुरमीत रामरहीम या फिर कौशलेंद्र प्रपन्नाचारी फलाहारी महाराज। इन्होंने बाबागीरी के बूते अरबों की संपत्ति बनाई। कई-कई एकड़ में आश्रम बनाए। चाहे इनका अतीत गुरबत में बीता हो, लेकिन बाबा बने कि अरबों के साम्राज्य के राजा बन गए। फिलहाल हमने तीन बाबाओं का ही बात की है। ऐसे बाबाओं हमारे देश में कोई कमी नहीं हैं। लेकिन हमारा सवाल बाबाओं से नहीं, इस बार जनता से है।