संदिग्धावस्था में पकड़े गए किशोरों को बाल कल्याण समिति से छुड़ाने वाली मां अविवाहित निकली। 18 जनवरी को सदर थाना क्षेत्र से पुलिस ने दो किशोरों को संदिग्ध अवस्था में पकड़ा था। पुलिस ने किशोरों को बाल कल्याण समिति को सुपुर्द कर दिया। उसी दिन राजगढ़, मध्यप्रदेश के केडिया गांव निवासी एक महिला ने समिति में बच्चों को मुक्त कराने के लिए गुहार लगा दी। महिला का आधार कार्ड देखकर समिति ने उसी समय दोनों बच्चे उसको सौंप दिए।
स्वयंसेवी संस्था की जांच में खुलासा
इसके बाद एक स्वयंसेवी संस्था ने मध्यप्रदेश में महिला के दिए गए पते पर जांच करवाई। जांच में सामने आया कि वह महिला अविवाहित है। साथ ही जिसे अपना पति बताती है वह उसकी बहन का पति है। महिला बच्चे से चोरी करवाने का काम करती है। अपने आप को मजबूर और गरीब बताने वाली महिला समिति व गांधी नगर स्थित स्नेह आंगन में बच्चों को मुक्त करवाने के लिए वकील को लेकर पहुंची थी।
जांच न पड़ताल,खानापूर्ति कर करते हैं सुपुर्द
नया जुवेनाइल जस्टिस (किशोर न्याय) अधिनियम लागू हो गया हो, लेकिन शहर में अधिकारी कानून को दरकिनार कर लगातार बाल तस्करी को बढ़ावा दे रहे हैं। बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्यों में गिरोह के लोग पैसे कमाने का लालच देकर माता-पिता की सहमति से बच्चों को लाते हैं। बच्चों को चोरी, भीख मांगना सिखाते हैं। शादियों में चोरी करवाते हैं। पकडे़ जाने पर बुजुर्ग महिला उनकी मां या दादी बनकर बाल कल्याण समिति से छुड़वा लेती हैं। दूसरी ओर, बाल कल्याण समिति के जिमेदार अधिकारी भी महज चंद कागजों की खानापूर्ति कर बच्चों को सौंप देते हैं। वह न कागजों की और न ही परिजन बनकर आने वाले व्यक्ति की जांच करते हैं।
लापरवाही पहले भी...
नवंबर 2015 में भट्टा बस्ती क्षेत्र से दो माह में चूड़ी बनाने के कारखाने से 13 बच्चों को मुक्त कराया था। सभी बच्चे बिहार के मुजफरपुर जिले के थे। 13 बच्चों की ट्रेन की टिकट भी करवा दिया। लेकिन 12 बच्चों की घर वापसी हुई। समिति ने सभी बच्चों की सुपुर्दगी भी बिहार की टीम को दी थी। लेकिन, उसी दिन एक बच्चे को उसके परिजनों को सौंप दिया।
सिर्फ शपथ पत्र पर सौंप दी बच्ची
मई 2015 में शादी में चोरी की आशंका से पकड़ी गई दस वर्षीय बच्ची को परिजनों का सत्यापन किए बिना महज एक शपथ पत्र लेकर बच्ची सौंप दी थी। तब एक गैर स्वयंसेवी संस्था ने महिला के बताए पते पर मध्य प्रदेश के गांव में जाकर जांच की थी। जांच में सामने आया था कि महिला छोटे बच्चों से दिल्ली, भोपाल, जयपुर जैसे शहरों में चोरी करवाने व भीख मंगवाने का काम करती है।
सुपुर्दगी से पहले कभी नहीं होती जांच
- बाल कल्याण समिति किसी भी बच्चे की सुपुर्दगी से पहले कोई ततीश नहीं करवाती। आधार कार्ड, राशन कार्ड या कोई भी पहचान पत्र देखकर व्यक्ति को बच्चा सौंप देते है, जबकि कानून के अनुसार गैर सरकारी संस्था के माध्यम से इंसान व संबंधित पते की जांच करवाना अनिवार्य हैं।
-समिति के केवल एक सदस्य या अध्यक्ष ही बच्चे के लिए अंतिम फैसला ले रहे है। बच्चे के लिए सुपुर्दगी, पुनर्वास या अन्य कोई फैसला लेने के लिए समिति के कोरम में दो सदस्यों या एक अध्यक्ष व एक सदस्य का होना अनिवार्य है।
जांच कराना समिति का काम नहीं
- अगर परिजन वैध पहचान पत्र दिखाते हैं तो उन्हें बच्चे सौंप दिए जाते हैं। जांच कराना समिति का काम नही हैं। कई बार परिस्थितियों के कारण कोई सदस्य फैसला ले लेता है तो अगले दिन बाकी सदस्य अपना अनुमोदन कर देते हैं।
- रामप्रकाश बैरवा, अध्यक्ष, बाल कल्याण समिति