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World Heritage Day: यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है राजस्थान की गुलाबी नगरी, बेहद रोचक है इसका इतिहास

World Heritage Day: जयपुर शहर की स्थापना 1727 में महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने की थी। 'जैपर' विश्व का पहला सुनियोजित शहर है, जिसका पहले नक्शा बना फिर बसावट की गई।

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World Heritage Day: विश्व विरासत जयपुर शहर का स्थापना दिवस हर साल 18 नवंबर और विश्व धरोहर दिवस 18 अप्रेल को मनाया जाता है। जयपुर शहर की स्थापना 1727 में महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने की थी। 'जैपर' विश्व का पहला सुनियोजित शहर है, जिसका पहले नक्शा बना फिर बसावट की गई। जयपुर अपनी स्थापना के समय गुलाबी रंग का नहीं था बल्कि 1875 में सवाई रामसिंह ने जयपुर का गुलाबी रंग करवाया।

इसके बाद देश-दुनिया में जयपुर को गुलाबी नगर और पिंकसिटी के रूप में पहचान मिली। जयपुर की चारदीवारी (परकोटा) को यूनेस्को ने विश्व धरोहर सूची में शामिल किया। अजरबैजान की राजधानी बाकू में हुई विश्व धरोहर समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया। 6 जुलाई 2019 को जयपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल की सूची में जोड़ा गया है। 5 फरवरी 2020 को यूनेस्को महानिदेशक ऑड्रे अजोले ने वर्ल्ड हेरिटेज सिटी का प्रमाण पत्र दिया।

भूमिगत मेट्रो ट्रेन की सौगात मिली

23 सितंबर 2020 को जयपुर को भूमिगत मेट्रो ट्रेन की सौगात भी मिल गई। जयपुर शहर में ज्योतिषी गणनाओं को ध्यान में रखते हुए नवग्रहों के अनुरूप नौ चौकड़ियां बसाई गईं। अष्टसिद्धि और नौ निधि को साकार करने के लिए नौ चौकड़ियां बनाई गई। जयपुर को बसाने वाले सवाई जयसिंह द्वितीय खुद खगोलशास्त्र के बड़े विद्वान थे। जयपुर को ज्योतिष और संस्कृति की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। यहां का जंतर-मंतर इसका उदाहरण है। 1942 में महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय और तत्कालीन प्राइमिनिस्टर सर मिर्जा इस्माइल ने जयपुर को आधुनिक रूप दिया।

1943 में ही जयपुर के परकोटे के बाजारों में लगे टीनशेड हटाकर यहां बरामदें बनवाए गए और बाजारों को एकरूपता दी गई। इतिहास के जानकार जितेंद्र सिंह शेखावत के अनुसार सवाई जयसिंह के समकालीन राजकवि श्रीकृष्ण भट्ट ने ईश्वर विलास महाकाव्य में लिखा है कि प्रबल प्रवाह के साथ बहने वाली द्रव्यवती नदी की जल धारा को सवाई जयसिंह नई राजधानी जयपुर में लाए थे। जयपुर शहर ऊंचा होने से बांडी की नहर लाने में कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद प्रमुख वास्तुकार विद्याधर बंगाली को द्रव्यवती नदी से नहर बनाकर जयपुर में पानी लाने में सफलता मिली।

चांदपोल दरवाजे के पास बालानंद जी मठ के पीछे सरस्वती कुंड बनाया गया। कुंड का पानी शहर में मोरी व नालियों से जोड़ा गया। यह नहर छोटी बड़ी व रामगंज चौपड़ से होते हुए सांगानेर की तरफ निकाली गईं। चूने मसाले से बनीं गुप्त नहर में से घुड़सवार आसानी से निकल सकता था। नहर के बहने के साथ जगह जगह हौज व मोखे बनवाए गए, जिससे आम आदमी अपने घर के सामने ही पानी भर लेता था। नई राजधानी के लिए द्रव्यवती की यह नहर गुप्त गंगा थी।

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शहर की सड़क पक्की हो जाने और द्रव्यवती का बांध टूट जाने से यह नहर मिट्टी में दफन होती गई। मेट्रो रेल के लिए की गई खुदाई के दौरान गुप्त नहर के अवशेष मिले थे। चौपड़ों के जल कुंडों में इस गुप्त नहर का जल गोमुख से निकलता था। सवाई मानसिंह के समय सर मिर्जा इस्माइल ने बाजारों में अशोक के पेड़ लगाए। अब त्रिपोलिया बाजार क्षेत्र में नाम मात्र के वृक्ष बचे हैं। चौपडों के खंदों में बड़ के वृक्षों की सघन छाया में बैठ कर लोग गर्मी का आसानी से मुकाबला कर लेते थे।

सन 1867 में महाराजा पुस्कालय चौड़ा रास्ता में खोला गया। इसमें अंग्रेजी में छपी पत्र पत्रिकाएं ज्यादा आतीं थीं। रियासतकाल में जयपुर के बाजारों का फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए सुरक्षित था। सवाई राम सिंह के समय प्रजा की सुरक्षा के लिए सभी बड़े बाजारों में प्रत्येक पचास गज की दूरी पर पुलिस के जवान खड़े रहते थे। फुटपाथ पर अतिक्रमण करने की किसी की हिम्मत नहीं थी। बाजारों में बैल और ऊंट गाड़ियों के अलावा हाथी व बग्घियां चलती थीं। गोबर और अप​शिष्ट पदार्थ उठाने के लिए सुबह से शाम तक बाजारों में सफाई कर्मचारी तैनात रहते।

इतिहासकार बताते हैं कि चौड़ा रास्ता, जौहरी बाजार व त्रिपोलिया बाजार सहित सभी मुख्य मार्गों और गलियों में सड़कें व फुटपाथ बनवाए गए। नगर की सफाई व्यवस्था का जायजा लेने के लिए अंग्रेज स्वास्थ्य अ​धिकारी घोड़े पर बैठ कर सुबह जल्दी निकलता और सूरज उगने के पहले वह रेजीडेंसी आ जाता था। सन 1869 में नाले-नालियां बनाने के साथ ही सफाई पर बहुत ध्यान दिया गया। बाजारों में केरोसिन से जलने वाली लैंप वाले खंभे लगाए गए। मशालची दिन में उनमें तेल डालते और शाम ढलने के बाद लैंप को जलाते। रोशनी के लिए यह लैंप पोस्ट इंग्लैंड से बनकर आए। इन पर एसआरएस यानी सवाई राम सिंह के नाम का मोनोग्राम बना था।

उस दौर में सड़क-फुटपाथ पर पीक थूकने वाले को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाता था। ​भिश्ती सूरज उगने के पहले ही मश्कों से नालियों की सफाई कर देते थे। कचरे को भैंसा गाड़ी में भर कर दरवाजों के पास बने कचरा गृह में डालते। घाटगेट से चलने वाली कचरा रेल से कचरे को वर्तमान जयंती बाजार में गंदी मोरी पर डाला जाता था। सुनियोजित इस शहर की खूबसूरती दिनोंदिन बढ़ रही है तो देश दुनियां के सैलानी भी यहां खिंचे चले आते हैं। परकोटा क्षेत्र में जंतर मंतर, सरगासूली, सिटी पैलेस, हवामहल सहित अन्य ऐतिहासिक धरोहरों को देखने हर साल बड़ी संख्या में पर्यटक यहां आते हैं।

जयपुर की इन्हीं खासियतों को देखकर जयपुर शहर को विश्व धरोहर का दर्जा मिला। परकोटे में गोविंददेव मंदिर सहित बड़ी संख्या में मंदिर हैं। जहां आस्था की बयार बहती है। वहीं यहां की लोक कला, संस्कृति, मेले और त्योहार भी देसी-विदेशी सैलानियों को आकर्षित करते हैं।

एक नजर

18 अप्रेल विश्व धरोहर दिवस
18 नवंबर जयपुर का स्थापना दिवस
1727 में हुई जयपुर शहर की स्थापना
महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने की स्थापना
1875 में सवाई रामसिंह ने करवाया गुलाबी रंग
6 जुलाई 2019 को यूनेस्को की विश्व धरोहर में हुआ शामिल
5 फरवरी 2020 को यूनेस्को महानिदेशक ने दिया प्रमाण पत्र
23 सितंबर 2020 को मिली भूमिगत मेट्रो ट्रेन की सौगात
बसावट से 150 साल पहले की थी कल्पना
नवग्रहों के अनुरूप नौ चौकड़ियां बसाई गईं
अष्टसिद्धि, नौ निधि को साकार करने नौ चौकड़ी बनाई गईं
जयपुर का आर्किटेक्चर विद्याधर चक्रवर्ती ने तैयार किया
परकोटा क्षेत्र में ही हैं जंतर-मंतर, हवामहल, सिटी पैलेस
1942 में परकोटे के बाजारों को एकरूपता दी गई


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