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Big Issue: 18 से 24 वर्ष के 77 फीसदी युवा नोमोफोबिया के शिकार

- पत्रिका सर्वे में सच आया सामने- महीने में औसतन 11 जीबी इंटरनेट डेटा का उपयोग- 84 फीसदी लोगों को सुबह उठते ही 15 मिनट मोबाइल देखने की आदत

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Big Issue: 18 से 24 वर्ष के 77 फीसदी युवा नोमोफोबिया के शिकार

Big Issue: 18 से 24 वर्ष के 77 फीसदी युवा नोमोफोबिया के शिकार

- चंद्रशेखर व्यास @ जैसलमेर. देश-दुनिया और नजदीक-दूर के सभी लोगों के बीच सेतु का काम करने वाला मोबाइल विशेषकर इंटरनेट की सुविधा से संपन्न स्मार्टफोन इसके उपयोगकर्ताओं के लिए सीमांत जैसलमेर जिले में नशीले पदार्थों से भी ज्यादा दिमाग पर असरकारी साबित हो रहा है। विशेषकर शहर सहित ग्रामीण क्षेत्र के युवा इसकी जद में आए हुए हैं, फिर वे चाहे पढ़े-लिखे हों या नहीं। जैसलमेर में मोबाइल के प्रति दीवानगी चरम पर है। राजस्थान पत्रिका की ओर से करीब 50 अभिभावकों और इतने ही युवाओं से हुए वार्तालाप और साक्षात्कार के सर्वे में चौंकाने वाले नतीजे मिले हैं। मोबाइल और इन्टरनेट का एडिक्शन, सोशल मीडिया पर स्टेटस अपडेट के प्रति दीवानगी, हर पल वीडियो और रील्स बनाने की आतुरता, और आभासी दुनिया में जीने की ललक व्यक्ति में अहंकार और स्तुति गान की प्यास तो जगा ही रहा है, युवाओं व बच्चों को उनके प्राथमिक कार्य पढ़ाई-लिखाई से दूर कर रहा है।
यह तथ्य आए सामने
- 90 फीसदी युवतियां और 75 फीसदी युवक किसी से समारोह में जाते ही सबसे पहले उस समारोह के वीडियो बनाने, फोटो खिंचवाने, रील बनाने या स्लो मोशन वीडियो निर्माण को प्राथमिकता देते हुए यही सोचते हैं कि किस फोटो या वीडियो को फेसबुक स्टेटस या व्हाट्सएप स्टेटस बनाना मुफीद रहेगा?
- 90 फीसदी युवाओं को अपने माता पिता का फोन नम्बर तक याद नहीं है। 95 फीसदी युवाओं ने पिछले पांच सालों में पाठ्यक्रम के अलावा एक भी किताब नहीं खरीदी और न ही पढ़ी।
- महिलाएं अपने बच्चे को मोबाइल रूपी खिलौना थमा कर फ्री होना चाहती हैं। जैसलमेर में 85 फीसदी महिलाओं के बच्चे और वे महिलाएं मोबाइल एडिक्शन का शिकार हो रहे हैं।

मोबाइल का अत्यधिक उपयोग घातक
- इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इनोवेटिव रिसर्च ऑन कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में छपे शोध के अनुसार मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल आंखों के रिफ्लेक्स को खराब करता है, अनिद्रा बढ़ाता है, प्रजनन तंत्र को खराब करता है और मानसिक स्वास्थ्य को बिगाड़ता है।
- जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी की रिसर्च के अनुसार बच्चे के स्क्रीन टाइम में बेरहमी से कटौती की जानी जरूरी है अन्यथा उसका मानसिक स्वास्थ्य बिगडऩा तय है।
- स्वीडन के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन वर्किंग लाइफ के अध्ययन में एक सम्भावना दर्शाई है कि मोबाइल फोन के मात्र दो मिनट के प्रयोग के बाद से ही त्वचा पर थकान, सिरदर्द और जलती हुई उत्तेजना शुरू हो सकती है।
- ब्रिटेन के राष्ट्रीय रेडियोलॉजिकल प्रोटेक्शन बोर्ड के अनुसार, मोबाइल फोन उपयोगकर्ता माइक्रोवेव ऊर्जा को अवशोषित करता है और इस कारण आंखों, मस्तिष्क, नाक, जीभ और आसपास की मांसपेशियों को नुकसान पहुंचने की सम्भावना बढ़ जाती हैं। अब सामाजिक और जातीय संगठनों को यह पहल चलानी चाहिए कि घरों में रोज एक घंटा कागज की किताब लेकर सेल्फ स्टडी करने का हो।

एक्सपर्ट व्यू -
महीने में औसतन 11 जीबी इन्टरनेट डेटा का उपयोग, शोध के अनुसार 84 फीसदी लोगों का सुबह उठते ही 15 मिनिट मोबाइल देखना, डाउनलोड होने वाली 40 फीसदी सामग्री सिर्फ लुगदी साहित्य की होना, 18 से 24 वर्ष के युवाओं में 77 फीसदी लोगों का नोमोफोबिया यानी नो मोबाइल फोबिया बीमारी का शिकार होना अत्यंत चिंताजनक है। विश्व आर्थिक मंच ने भी अपनी जोखिम रिपोर्ट में बताया है कि सोशल मीडिया के जरिए झूठी सूचना का प्रसार बहुत बड़ा जोखिम है। स्मार्टफोन युवाओं को स्मार्ट नहीं अपितु क्रिमिनल माइंडेड बनाने की दिशा में काम करता प्रतीत होता है। अपराध ब्यूरो की रिपोट्र्स और पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार पिछले एक वर्ष में महिलाओं पर हुए अत्याचारों की मूल वजह रहा है युवाओं द्वारा मोबाइल पर वाहियात वेबसीरीज देखना, बुरे कंटेंट के वीडियो देखना और इसी वजह से उनका दिमाग अपराधियों जैसा बन रहा है।
- डॉ. गौरव बिस्सा, राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त मैनेजमेंट ट्रेनर और काउंसलर