
Jain temples in Jaisalmer (Patrika Photo)
जैसलमेर: स्थापत्य कला और आध्यात्मिकता का अद्भुत संगम माने जाने वाले जैसलमेर के सोनार दुर्ग में स्थित जैन मंदिर देश-दुनिया के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। आठ तीर्थंकरों को समर्पित इन जिनालयों में प्रतिदिन 6,666 प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना होती है, जिससे पूरा परिसर भक्ति और श्रद्धा के वातावरण में रंगा रहता है।
इन मंदिरों का निर्माण 14वीं से 18वीं सदी के बीच सोमपुरा शिल्पकारों ने किया। यहां मूलनायक चिंतामणि पार्श्वनाथ के अलावा संभवनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, चंद्रप्रभु, आदिनाथ, सीमंधर स्वामी और महावीर स्वामी के मंदिर हैं।
हर मंदिर अपनी बारीक नक्काशी, भाव-भंगिमा युक्त मूर्तियों, नृत्य-वाद्य शैलियों और कलात्मक तोरण द्वारों के कारण दर्शकों को मंत्रमुग्ध करता है। संभवनाथ मंदिर के भूमिगत कक्ष में स्थित ज्ञान भंडार में हजारों प्राचीन ताड़पत्र ग्रंथ और धार्मिक सामग्री सुरक्षित है। इन मंदिरों की शोभा बेल-बूटों की सूक्ष्म तक्षण कला, हाथी-घोड़े-सिंह की आकृतियों और ऐतिहासिक तोरणों से और बढ़ जाती है।
जैन समाज के प्रवक्ता पवन कुमार जैन ने बताया कि दुर्ग स्थित मूल जिनालय 23वें तीर्थंकर चिंतामणि पार्श्वनाथ का है, जिसकी प्रतिष्ठा संवत 1473 में हुई थी। यह प्रतिमा विक्रम संवत 02 की मानी जाती है और बालू मिट्टी से बनी है, जिस पर मोतियों का लेप किया गया है। यह प्रतिमा लौद्रवा से लाई गई थी।
वर्तमान में दुर्ग में 6600 से अधिक जिन प्रतिमाएं और 871 वर्ष पुराने दादा जिनदत्त सूरि महाराज के वस्त्र श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं। हर जिनालय उस समय के श्रावकों की गहरी श्रद्धा और धार्मिक भावना को प्रकट करता है। सोनार दुर्ग के अतिरिक्त लौद्रवा, अमरसागर, देवीकोट, ब्रह्मसर और पोकरण में स्थित जैन मंदिर भी स्थापत्य और आस्था की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
Updated on:
01 Aug 2025 11:19 am
Published on:
01 Aug 2025 11:19 am
