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धरोहरों के संरक्षण के लिए आखिर जिम्मेदार कौन

- जगह-जगह धरोहरों के मौलिक स्वरूप को बिगाडऩे की हिमाकत- हाल ही में कुलधरा में मकान की दीवार तोडऩे का मामला सुर्खियों में
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धरोहरों के संरक्षण के लिए आखिर जिम्मेदार कौन

धरोहरों के संरक्षण के लिए आखिर जिम्मेदार कौन

कुलधरा में प्राचीन पालीवाल सभ्यता की निशानी के तौर पर एक खंडहरनुमा मकान की दीवार को एक युवक की ओर से रील बनाने के लिए तोड़े जाने का मामला सुर्खियों में आने के बीच एक बार फिर सैकड़ों साल प्राचीन जैसलमेर और इसके ग्रामीण क्षेत्रों में अवस्थित प्राचीन धरोहरों के संरक्षण का मसला उभर कर सामने आया है। मध्यकाल में सिल्क रूट का हिस्सा रहे और वर्तमान समय में भारत-पाकिस्तान की साढ़े चार सौ किलोमीटर लम्बी अंतरराष्ट्रीय सीमा को अपने अंचल में समेटे जैसलमेर की पहचान प्रसिद्ध पर्यटन स्थल के तौर पर बन चुकी है। जैसलमेर का त्रिकुट पहाड़ी पर स्थित रिहायशी सोनार दुर्ग हो या कलात्मक पटवा हवेलियां और ऐतिहासिक गड़ीसर सरोवर...कुलधरा-खाभा जैसे दर्जनों पालीवाल सभ्यता की पुख्ता तस्वीर पेश करने वाले गांव और दूरदराज के क्षेत्रों में अवस्थित दुर्ग व जैसलमेर, लौद्रवा और अमरसागर आदि के अचम्भे में डालने वाले जैन मंदिर, ये सभी हमारी विरासत के अनमोल अध्याय हैं। इनके साथ ही गांवों तक बिखरी पुरा सम्पदा जिसकी सुध लेने वाला आज कोई नहीं है, बहुत कीमती धरोहर हैं। बताने की जरूरत नहीं है कि जैसलमेर का पर्यटन व्यवसाय अगर आज फल-फूल रहा है व आने वाले समय में जिसकी बढ़ोतरी की अपरिमित संभावनाएं सरकारी-व्यावसायिक स्तर पर जताई जाती हैं, सैकड़ों साल प्राचीन विरासत इसका आधार स्तम्भ है। अगर विरासतों की पूछ-परख ही नहीं की जाएगी और उन्हें वक्त के थपेड़ों से नहीं बचाया जाएगा तो देश और दुनिया के सैलानी भला किस वजह से जैसलमेर का रुख करेंगे, यह शोचनीय प्रश्र है। धरोहरों के संरक्षण के लिए जो भी जिम्मेदार विभाग हैं, वे अपनी जिम्मेदारी कायदे से निभाते कभी नजर नहीं आते।
प्राचीन क्षेत्र है जैसलमेर
जैसलमेर आज भले ही मरुस्थलीय भूभाग हो लेकिन कई शोध यह प्रमाणित कर चुके हैं कि कभी यहां विशाल जलस्रोत रहे हैं। सरस्वती नदी का प्रवाह क्षेत्र भी इसे बताया जाता रहा है। यहां हजारों साल पुराने जन जीवन तथा उससे भी पहले के जीव-जंतुओं के रहवास व विचरण का क्षेत्र माना जाता है। यहां तक कि हजारों साल पहले धरती से लुप्त हो चुके डायनासोर के फुटप्रिंट तक यहां ढूंढ़े जा चुके हैं। इन सब तथ्यों की जानकारी पर्यटकों को सामान्य तौर पर नहीं करवाई जाती और जियोलॉजिकल ट्यूरिज्म की बड़ी संभावनाओं के बावजूद इस दिशा में कदम नहीं उठाए जा रहे। अवैध कब्जों से लेकर इंसानी गतिविधियों से हजारों साल पुराने चिन्ह मिट भी रहे हैं। इनकी तरफ केंद्र व राज्य सरकारों के साथ इस क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों का ध्यान उस तरह से नहीं गया है, जैसी दरकार है।
नष्ट हो रही पुरा सम्पदा
- जैसलमेर की कलात्मक पटवा हवेलियों का तो फिर भी कमोबेश संरक्षण कर लिया गया लेकिन यहां की दीवान सालमसिंह की हवेली उपेक्षा का दंश झेलते हुए दिन-ब-दिन क्षरित होती जा रही है।
- जैसलमेर शहर के बाहरी भूभाग के साथ ही ग्रामीण इलाकों में पुरातन कला व संस्कृति से जुड़े अवशेष जहां-तहां बिखरे हुए हैं। उन पर अवैध कब्जों की मार पड़ रही है। उन्हें बेदर्दी से जाने-अनजाने नष्ट किया जा रहा है।
- जैसलमेर की समस्त प्राचीन विरासत का सूचीकरण तक नहीं किया गया है। जिससे पता चल सके कि कहां, कितने शिलालेख, छतरियां, थम्बलियां, देवी-देवताओं व जुंझारों की मूर्तियां, गोरधन और यहां तक कि शैव-वैष्णव तथा शाक्त परम्परा के मंदिर आदि बने हैं तथा उनका निर्माण किस कालखंड में किया गया। शिलालेखों पर क्या उत्कीर्ण किया गया है व यह सब कार्य किसने करवाया?
- जैसलमेर जिले में पानी के कितने प्राचीन स्रोत भी समय की मार से अपना अस्तित्व खो चुके हैं। कितने ही ऐसे अवशेषों को मशहूर लेखक अनुपम मिश्र ने अपनी दो पुस्तकों आज भी खरे हैं तालाब व राजस्थान की रजत बूंदें में प्रकाशित किया था।
- जैसलमेर का सोनार किला तक समय की मार से अछूता नहीं रहा। जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में अवस्थित गणेशिया, घोटारू, किशनगढ़, खाभा के किलों का सौन्दर्य भी अद्भुत है। देखभाल के अभाव में ये दुर्ग जर्जर हो रहे हैं।