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तीसरी लहर की आहट के बीच बच्चों पर निगरानी की दरकार

-शिक्षा विभाग से समन्वय पर जोर-दूसरे चरण का वैक्सीनेशन बढ़ाने की लगातार जरूरत

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तीसरी लहर की आहट के बीच बच्चों पर निगरानी की दरकार

तीसरी लहर की आहट के बीच बच्चों पर निगरानी की दरकार

जैसलमेर. कोरोना की तीसरी लहर और नए वैरिएंट ओमिक्रॉन की दस्तक की आशंकाओं के बीच सीमावर्ती जैसलमेर जिले में डेढ़ लाख से अधिक स्कूली बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर अभिभावकों में एक तरह की आशंका बनी हुई है। अभी तक १८ साल से अधिक आयु के लोगों का ही वैक्सीनेशन किया जा रहा है। इसमें भी जैसलमेर जिला दूसरी डोज के मामले में प्रदेश के औसत से थोड़ा पीछे ही है। वहीं स्कूली बच्चे तो पूरी तरह से असुरक्षित ही बने हुए हैं। राज्य सरकार ने कोरोना संक्रमण के मामलों में एकदम से कमी आ जाने के बाद फिलहाल सारी पाबंदियां एक तरह से हटा दी और स्कूलों में सभी उम्र तथा कक्षाओं के विद्यार्थियों की शत प्रतिशत ऑफलाइन पढ़ाई को मंजूरी दे दी। इस बीच जिले के स्कूलों की जो तस्वीर सामने आ रही है, वह चिंता में डालने वाली है। प्राय: चार-पांच वर्ष से लेकर १७ साल तक के विद्यार्थी स्कूलों में पढ़ रहे हैं और बड़ी तादाद में वे पढ़ाई के लिए सरकारी-निजी विद्यालयों में पहुंच भी रहे हैं। जानकारी के अनुसार वे अब कोरोना की पाबंदियां कम ही बरत रहे हैं। उनमें सोशल डिस्टेंसिंग और अन्य कोविड अनुरूप व्यवहार देखने को नहीं मिलता। कई विद्यालयों में बच्चे पीने के पानी की बोतल तथा भोजनावकाश में टिफिन भी साझा कर रहे हैं। अभी तक बच्चों के टीकाकरण को भारत में मंजूरी नहीं मिली है। पिछली दो लहरों के दौरान बच्चों की पढ़ाई में आए व्यवधान के मद्देनजर अभिभावक आशंका का भाव होने के बावजूद उन्हें नियमित स्कूल भेज रहे हैं।
समझाइश का ही सहारा
हजारों वर्ग किलोमीटर में छितरी हुई आबादी के रूप में बसे जैसलमेर जिले में जिला प्रशासन इस संबंध में समझाइश के आधार पर ही आगे बढ़ सकता है। प्रशासन ने शिक्षा विभागीय अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे संस्था प्रधानों व शिक्षकों को प्रेरित करें कि कोरोना को फैलने की आशंका को निर्मूल करने में अपनी भूमिका निभाएं। जिले में सरकारी व निजी स्कूलों का आंकड़ा मिलाएं तो यह सं या डेढ़ हजार तक होती है। जो शहर से गांव-ढाणियों तक फैली हुई हैं। चिकित्सा विभाग ने कुछ स्कूलों में बच्चों की रैंडमली स्वास्थ्य जांच का अभियान चलाया है लेकिन यह भी व्यावहारिक तौर पर बहुत ज्यादा असरदार नहीं हो सकता क्योंकि दूरदराज के क्षेत्रों में चिकित्सा विभाग की टीमें विद्यालयी बच्चों के बीच नहीं पहुंच सकती। ऐसे में यही संभव है कि शिक्षक वर्ग अपने यहां अध्ययनरत बच्चों को कोविड अनुरूप व्यवहार करने के लिए जागरुक करें। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि बच्चे अभिभावकों की तुलना में भी ज्यादा बात पढ़ाने वाले शिक्षकों की मानते हैं।
वैक्सीन लगाने पर हो जोर
दूसरी तरफ राज्य में नए सिरे से कैसेज के सामने आने और जैसलमेर में पिछले दिनों के दौरान एक स्थानीय द पती और सैन्य बलों के कुछ जवानों के कोरोना से संक्रमित पाए जाने के बाद चिकित्सा विभाग पुन: सक्रिय हुआ है। आधी वयस्क आबादी ने ही दूसरी डोज लगवाई थी, इस आंकड़े को बढ़ाने के लिए अब चिकित्सा महकमा घर-घर दस्तक अभियान चलाकर वंचित लोगों के टीकाकरण में जुट गया है। जिससे एक तरह से टीकाकरण की रुकी हुई प्रक्रिया पुन: तेज हो रही है। हालांकि पूरी गति तो जनसामान्य के स्वयं सक्रिय होने से ही आ पाएगी। अभी तक करीब ५५ प्रतिशत लोगों ने दूसरी डोज लगवाई है। पहली डोज का १५ प्रतिशत और दूसरी का ४५ प्रतिशत वयस्क आबादी को सुरक्षा चक्र नहीं मिलना कम परेशानी का सबब नहीं है।

शत प्रतिशत वैक्सीनेशन में सहयोग करें
जैसलमेर जिलावासियों से अनुरोध है कि वे कोरोना से पूर्णतया बचाव के लिए शत प्रतिशत वैक्सीनेशन के लिए चलाए जा रहे अभियान में भागीदारी निभाएं। इसके अलावा कोविड जैसे लक्षण होते ही तुरंत जांच करवाएं और उपचार लें। मास्क अवश्य लगाकर रखें। यह कोरोना को हराने में बहुत मददगार है। जहां तक स्कूली बच्चों का सवाल है, उनके संबंध में शिक्षकों को आवश्यक दिशा निर्देश दिए जा रहे हैं। जिन बच्चों में कोविड या आइएलआइ के लक्षण हो, उन्हें घर पर ही रखा जाए। जो बच्चे स्कूल आते हैं, उनके बीच जहां तक संभव हो दूरी रखी जाए। हम उ मीद करते हैं कि टीम भावना से काम किए जाने से जिले के बच्चों में कोविड संक्रमण नहीं होगा।
- आशीष मोदी, जिला कलक्टर जैसलमेर