
राजस्थान के हालिया बजट में जैसलमेर के लिए एक बहुत बड़ी घोषणा यहां जीरा मंडी की स्थापना करने के तौर पर हुई है। इससे जिले के हजारों किसानों की बांछें खिल गई हैं। दरअसल विगत कुछ वर्षों में जीरा उत्पादन में सीमांत जैसलमेर जिले ने पूरे देश के साथ दुनिया भर में धाक जमाई है। किसानों को 1500 से 2000 करोड़ रुपए तक की कमाई इस फसल से हुई है और उत्पादन 5 से 7 लाख क्विंटल तक पहुंच गया। यही कारण रहा कि पिछले सालों के दौरान जिले में जीरा की फसल का रकबा लगातार बढ़ता गया है। गत रबी सीजन में यह 90 हजार हैक्टेयर के लक्ष्य से 140 प्रतिशत ज्यादा यानी 1.26 लाख हैक्टेयर तक पहुंच गया था। इसकी वजह साल 2023 में जीरे के भाव आसमान छू जाना रही थी। हालांकि इस बार जीरे का रिकॉर्ड उत्पादन होने और बाड़मेर, जालोर-सांचौर, जोधपुर आदि अन्य जिलों में भी इस फसल के प्रति किसानों का रुझान बढऩे से भाव 25 हजार से 32 हजार प्रति क्ंिवटल तक रहा। फिर भी यह कम नहीं है। जैसलमेर में जीरा मंडी की स्थापना होने से यहां के किसानों को गुजरात ऊंझा या धानेरा शहरों में जाकर अपना माल बेचने की मजबूरी नहीं रहेगी। इसका सबसे ज्यादा फायदा अपेक्षाकृत छोटे किसानों को होने वाला है।
जैसलमेर में जीरा मंडी नहीं होने के कारण अनेक छोटे किसानों का जीरा स्थानीय व्यापारी अपनी शर्तों पर खरीद लेते हैं। ये स्टॉकिस्ट कम भाव में माल खरीदकर अच्छी कीमत का इंतजार करते हैं और अच्छी कीमत मिलने पर जीरा बेचकर कई बार दोगुना लाभ तक कमाते हैं। छोटे किसान जिनके यहां 5-7 या 10-12 बोरी जीरा होता है, वे उनके हाथ उनकी शर्तों पर जीरा बेचने के लिए विवश रहते हैं। किसानों की यह बड़ी मांग थी कि जैसलमेर में जीरे की स्पेशल मंडी हो जाए तो उन्हें कम दामों में अपनी फसल नहीं बेचनी पड़ेगी।
जैसलमेर में आदर्श परिस्थितियां
फसल उत्पादन-गुणवत्ता की दृष्टि से प्रमुख मसालों में शुमार जीरा सबसे ज्यादा पश्चिम राजस्थान में होता है। क्षेत्र में देश का करीब 60 प्रतिशत जीरा उत्पादन होता है। जैसलमेर की शुष्क परिस्थितियां जीरा उत्पादन के लिए ही श्रेष्ठ नहीं है, श्रेष्ठ जीरा उत्पादन के लिए भी बहुत माकूल है। माना जाता है कि जैसलमेर के झिनझिनयाली बेल्ट में दुनिया का सबसे उम्दा किस्म का जीरा उगता है। जिले में करीब 20 हजार कृषि ट्यूबवैल और हजारों नहरी मुरब्बों में खेती से अन्य जींसों के साथ जीरा रिकॉर्ड स्तर पर उत्पादित होने लगा है। जैसलमेर सहित पश्चिमी राजस्थान का जीरा बड़े आकार का होता है और उसमें भार भी अधिक रहता है, वहीं गुजरात के जीरे का दाना छोटा और हल्का होता है। हमारे यहां का जीरा धारीदार व अलग-अलग रंग का होता है, जबकि गुजरात का जीरा बिना धारी वाला व एक ही रंग का होता है। इसी तरह से पश्चिमी राजस्थान के जीरे की उम्र लम्बी होती है, यह 4-5 सालों तक खराब नहीं होता है और उपयोगी होता है, जबकि गुजरात के जीरा एक साल के अंदर ही खराब हो जाता है। उसके दाने का पाउडर बन जाता है। जानकारों के अनुसार पश्चिम राजस्थान की मिट्टी जीरे के लिए उपयुक्त होने से जीरे में खनिज पाए जाते हैं, जबकि गुजरात के जीरे में इसका अभाव होता है इसलिए वहां के जीरे की फसल में बीमारियां लगने की संभावना ज्यादा रहती हैं। फिर भी राजस्थान में प्रोसेसिंग इकाइयां ज्यादा नहीं होने से यहां का जीरा ऊंझा मंडी जाता है। गुजरात में 300 से अधिक प्रोसेसिंग इकाइयां चल रही है, जबकि राजस्थान में इनकी संख्या 100 भी नहीं है। जैसलमेर में जीरा मंडी स्थापित होने से उससे जुड़ी अन्य इकाइयों की स्थापना का मार्ग भी निश्चित तौर पर प्रशस्त होगा।
किसानों के हित में कदम
जैसलमेर में जीरा मंडी की स्थापना के निर्णय का लाभ छोटे किसानों को खास तौर पर मिल सकेगा। हम जैसलमेर में ऑर्गेनिक खेती को भी अपना रहे हैं, इससे जीरे का भाव और अधिक मिलता है।
Published on:
17 Jul 2024 08:23 am
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