
तेज गर्मी और उमस के बीच सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर रामदेवरा पहुंचे जातरू।
जैसलमेर. तेज गर्मी और उमस के बीच पसीने से तरबतर चेहरे। पैरों की त्वचा जगह-जगह छिल चुकी है। कई पैरों में छाले हैं। चलने पर दर्द होता है, फिर भी कदम थमते नहीं। कोई धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है तो कोई बाबा का जयकारा लगाते हुए अपने साथियों से आगे निकल रहा है। रास्ते में कोई पूछता है—‘कैसे हो भाई?’ जवाब मिलता है—‘बाबा बुला रहे हैं, पहुंच ही जाएंगे।’
रामदेवरा मेले में इन दिनों आस्था का ऐसा ही मानवीय दृश्य दिखाई दे रहा है। रेगिस्तान की गर्म जमीन पर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर पहुंचे जातरुओं के चेहरे थके हुए हैं, लेकिन आंखों में बाबा के दर्शन की चमक है। गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश के साथ राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों से भक्त गांव, ढाणी और शहरों से ध्वजा लेकर पैदल निकले हैं।
किसी के कंधे पर बाबा का निशान है तो किसी के हाथ में ध्वजा। किसी के साथ पूरा संघ चल रहा है तो कोई अकेला ही कई दिनों से रास्ता नाप रहा है। तेज गर्मी शरीर को थकाती है, उमस बेचैन करती है और जंगल के रास्ते जहरीले जीव-जंतुओं का डर बना रहता है। इसके बावजूद संकल्प एक ही है—बाबा के दरबार में पहुंचना।
गुजरात के वडोदरा से आए 60 वर्षीय रतनभाई करीब 700 किलोमीटर की पदयात्रा कर रामदेवरा पहुंचे। उनके पैरों में छाले थे। चलने में तकलीफ हो रही थी। कुछ देर बैठकर उन्होंने पैर सहलाए और फिर उठकर कतार की ओर बढ़ गए।
रतनभाई कहते हैं, 'रास्ता लंबा था, गर्मी भी बहुत मिली, तकलीफ भी हुई, लेकिन मन में बाबा का नाम था। इसलिए कदम चलते रहे।
पंचमहल क्षेत्र से आए सुरेशभाई भी कई बार पैदल रामदेवरा पहुंच चुके हैं। इस बार गर्मी और उमस के कारण रास्ते में परेशानी ज्यादा रही। पसीने से कपड़े भीगते रहे, पैर लगातार चलते रहे और छालों का दर्द बढ़ता गया। लेकिन मंदिर के पास पहुंचते ही उनकी चाल में फिर तेजी दिखाई दी।
'बाबा के दर्शन के लिए पैदल चलना अपने आप में अलग अनुभव है। यहां पहुंचकर लगता है कि रास्ते की सारी थकान खत्म हो गई,' वे कहते हैं।
रामदेवरा में लग्जरी गाड़ियों से आने वाले श्रद्धालु भी हैं और साधारण वाहनों से पहुंचने वाले भी। पार्किंग में महंगी गाड़ियां कतार में खड़ी हैं, लेकिन मंदिर की ओर बढ़ते रास्ते पर पैदल जातरुओं का अपना अलग संसार है। इनमें मजदूरी करने वाले भी हैं और संपन्न परिवारों से आने वाले लोग भी। रास्ते में कपड़ों, जूतों या सामान से किसी की आर्थिक स्थिति पहचानना मुश्किल है। बाबा के दरबार तक पहुंचते-पहुंचते सबकी पहचान एक ही रह जाती है—भक्त।
पैदल जातरुओं के लिए मंदिर में अलग दर्शन व्यवस्था है। कतार में खड़े श्रद्धालु थके हैं, लेकिन जयकारों की आवाज लगातार सुनाई देती है। कोई आंखें बंद कर बाबा का नाम ले रहा है तो कोई अपने परिवार की तस्वीर हाथ में लिए खड़ा है। कतार में खड़े रहने का समय भी कई जातरुओं के लिए आराम का मौका बन जाता है। कोई पैर दबाता है, कोई पानी पीता है और कोई जमीन पर बैठकर कुछ पल आंखें बंद कर लेता है। फिर जैसे ही आगे बढ़ने का मौका मिलता है, सभी कतार में खड़े हो जाते हैं। समाधि के सामने पहुंचते ही कई चेहरों पर भाव बदल जाते हैं। घंटों की थकान, पैरों का दर्द और रास्ते की परेशानियां जैसे पीछे छूट जाती हैं। माथा टेकते ही आंखों में आंसू आ जाते हैं। कोई हाथ जोड़करखड़ा रहता है तो कोई कुछ पल आंखें बंद कर लेता है।
मेले के दौरान रामदेवरा में एक और दृश्य पदयात्रियों की संख्या की कहानी कहता है। कई भक्त मंदिर पहुंचकर अपनी चप्पलें और जूते छोड़ देते हैं। मेले के बाद जमा होने वाला यह ढेर उन अनगिनत कदमों की कहानी कहता है, जो दूर-दराज से चलकर यहां पहुंचे। अब कई शहरों और गांवों से सामूहिक पदयात्रा के संघ भी रामदेवरा पहुंच रहे हैं। इनके साथ डीजे, भजन गायक, भोजन-पानी और दूसरी जरूरी व्यवस्थाएं रहती हैं। रास्ते में जब भजनों की आवाज गूंजती है तो आसपास के गांव भी भक्ति के रंग में रंग जाते हैं। रामदेवरा में इन दिनों यही आस्था सबसे ज्यादा दिखाई देती है—पसीने से तर चेहरे, धूल से सने पैर, छालों का दर्द और चेहरे पर मुस्कान।
Updated on:
19 Sept 2026 08:35 pm
Published on:
19 Sept 2026 08:35 pm
