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चौदह वर्षों से जल सेवा मंडल निभा रहा मानवता और सेवा का दायित्व

देश की आजादी से पहले स्थापित पोकरण रेलवे स्टेशन पर आज भी पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। वर्ष 1939 में स्थापित इस स्टेशन ने करीब 87 वर्षों का सफर तय कर लिया है, लेकिन यात्रियों को अब भी शुद्ध और ठंडा पेयजल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।

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देश की आजादी से पहले स्थापित पोकरण रेलवे स्टेशन पर आज भी पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। वर्ष 1939 में स्थापित इस स्टेशन ने करीब 87 वर्षों का सफर तय कर लिया है, लेकिन यात्रियों को अब भी शुद्ध और ठंडा पेयजल उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। भीषण गर्मी के इस दौर में रेलवे की व्यवस्था यात्रियों की प्यास बुझाने में नाकाम साबित हो रही है। ऐसे में कस्बे के लोगों की पहल मानवता की एक मिसाल बनकर सामने आई है।

पोकरण रेलवे स्टेशन पर दो-तीन प्याऊ और पानी की टोटियां तो लगी हुई हैं, लेकिन यहां उपलब्ध पानी खारा और फ्लोराइडयुक्त होने के कारण पीने योग्य नहीं माना जाता। गर्मी के मौसम में स्थिति और गंभीर हो जाती है। टोटियों से आने वाला पानी इतना गर्म होता है कि उसे छूना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में सफर पर निकले यात्रियों को मजबूरी में बाजार से पानी की बोतलें खरीदनी पड़ती हैं।

समय के साथ रेलवे व्यवस्था में काफी बदलाव आया। पहले जहां भाप के इंजन चलते थे, वहीं अब आधुनिक डीजल और इलेक्ट्रिक इंजन ने उनकी जगह ले ली है। स्टेशन भवनों और प्लेटफॉर्म का भी जीर्णोद्धार किया गया, लेकिन यात्रियों की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत पेयजल व्यवस्था अब भी सवालों के घेरे में है।

जागरूक लोगों ने पेश की मानवता की मिसाल

जिम्मेदारों की इस शिथिलता के बीच कस्बे के जागरूक लोगों ने मानवता की मिसाल पेश की। कस्बे के व्यापारियों, समाजसेवियों और सरकारी कार्मिकों ने मिलकर 'जल सेवा मंडल' का गठन किया। इसकी शुरुआत विरेन्द्र मेवाड़ा और ओमप्रकाश शर्मा ने की थी। इसके बाद जयसिंह उज्ज्वल, पदमाराम सुथार, देवीप्रसाद पुरोहित, कैलाश दैया, मनोजकुमार केला, दलपतराम, आशीष पुरोहित, चैनाराम माली, जसवंत चारण और संजय गांधी सहित कई लोग इस सेवा अभियान से जुड़ते गए। टीम प्रतिदिन दोपहर की तपती गर्मी में रेलवे स्टेशन पर अपनी स्टॉल लगाती है। ठंडे पानी के कैम्पर रखकर यात्रियों को मनुहार के साथ शीतल जल पिलाया जाता है। साथ ही आगे की यात्रा के लिए उनकी बोतलों में भी ठंडा पानी भरकर दिया जाता है।

बीते 14 वर्षों से यह सेवा बिना किसी स्वार्थ के लगातार जारी है। अच्छी बात यह है कि इस कारसेवा से जुड़ने वालों की संख्या समय के साथ बढ़ती जा रही है। पोकरण रेलवे स्टेशन पर यह पहल अब सिर्फ जल सेवा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह सामाजिक सहभागिता, संवेदनशीलता और इंसानियत की एक जीवंत मिसाल बन गई है। सरकारी व्यवस्था जहां पीछे दिखाई देती है, वहीं आम लोग यहां हर दिन प्यास के साथ उम्मीद भी बुझा रहे हैं।