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त्योहारी सीजन से आस या फिर केवल मेलों पर निर्भरता

-बेहतर नीति का अभाव व प्रोत्साहन की कमी से बनी निराशाजनक स्थिति-देश-दुनिया में मशहर है नाम, लेकिन नहीं मिल रहे पर्याप्त दाम

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त्योहारी सीजन से आस या फिर केवल मेलों पर निर्भरता

त्योहारी सीजन से आस या फिर केवल मेलों पर निर्भरता

इनकी पुरखों की कला को पहचान तो देश-दुनिया में मिली, लेकिन कला के कद्रदान और प्रोत्साहन नहीं दिखाई दे रहे। इसके साथ ही बेहतर व्यावसायिक नीति का भी अभाव होने से कुम्भकारों का रुख दूसरे व्यवसायों की ओर होने लगा है। दूसरा पक्ष यह भी है कि इनके हाथों से तैयार टेराकोटा की आकृतियों व खिलौनों की मांग राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी है। मौजूदा समय में सरकारी सहायता के अभाव में कुंभकारों के लिए एक मात्र सहारा विभिन्न प्रदेशों में लगने वाले धार्मिक मेलों का रह गया है। हकीकत यह भी है कि स्थानीय बाजार में इन मूर्तियों व खिलौनों की मांग उम्मीद की तुलना में काफी कम है। ऐसे में इन्हें आजीविका के लिए अन्य प्रदेशों का रुख करना पड़ता है।
लाल मिट्टी से कमाल
जिले के पोकरण क्षेत्र में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार है, जो वर्षों से चली आ रही परम्परा के रूप में मिट्टी को बर्तनों के अलावा विभिन्न आकृतियों में ढाल रहे हैं। दिल्ली का लाल किला हो या आगरा का ताजमहल, एफिल टॉवर हो या दुनिया की मशहूर ऐतिहासिक इमारतें या फिर देवी-देवताओं की आकृति..। सभी को इन कलाकरों ने कला में ढाला है, लेकिन आज भी इनको कद्रदान नहीं मिल रहे हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद कला जगत में स्थानीय कुंभकारों को नाम तो मिला, लेकिन माकूल दाम नहीं मिलने से अब पुरखों की कला को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाने से कतरा रहे हैं।
दिवाली से आस, मेलों का सहारा
जिले के रामदेवरा गांव में बाबा रामदेव की समाधि स्थल पर लगने वाला अंतरप्रांतीय मेला इन कलाकारों को सहारा दे रहा है। मेले में बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं से इन कुभकारों को आर्थिक सहारा जरूर मिलता है। इन सबके बीच हकीकत यह भी है कि रामदेवरा में मेले के दौरान दुकान लगाना काफी महंगा रहता है। कुंभकारी कला से जुड़े लोग दिल्ली में चलने वाले ट्रेड फेयर, दिल्ली हाट, अहमदाबाद, मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्यों में भी उत्पाद बेचने को जाते हैं।
फैक्ट फाइल
-427 परिवार बनाते हैं मिट्टी के खिलौने, बर्तन व मूर्तियां
-114 परिवार 2 महीने तक करते है मिट्टी के दीपक व अन्य सामग्री
-2000 से अधिक दीपक बनाता है एक परिवार प्रतिदिन
-1.50 लाख रुपए होती है एक परिवार को आमदनी
प्रोत्साहन की दरकार
पोकरण के कुंभकारों की ओर से बनाए गए खिलौने, बर्तन सहित अन्य सामान देशभर में प्रसिद्ध है। हालांकि सरकार की ओर से पूर्व में सामान बनाने के लिए संबंधित परिवारों को इलेक्ट्रिक चाक वितरित की गई थी, लेकिन कोई विशेष सहायता नहीं मिली है। विश्वकर्मा योजना के तहत केन्द्र सरकार ने कवायद शुरू की है। यदि सरकार विशेष सहायता व पैकेज देती है तो मिट्टी उद्योग को बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही पोकरण के रिण क्षेत्र में अब केवल 4 खसरों में ही मिट्टी रही है और अन्य जमीन लवणीय है, जो काम की नहीं है। यदि अतिरिक्त खसरे आवंटित कर मिट्टी उपलब्ध करवाई जाती है तो कुंभकारों को लाभ मिल सकता है।
-सत्यनारायण प्रजापत, शिल्पगुरु माटीकला बोर्ड राजस्थान एवं प्रभारी कुंभकार हस्तकला विकास समिति, पोकरण