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कब तक खतरे से आंखें मूंदे रहेंगे जिम्मेदार ?

- खतरे से बचाव के लिए सोनार दुर्ग से निकालनी होगी वैकल्पिक राह- पर्यटन सीजन के उफान पर होने से दुर्ग में हादसे की आशंका

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कब तक खतरे से आंखें मूंदे रहेंगे जिम्मेदार ?

कब तक खतरे से आंखें मूंदे रहेंगे जिम्मेदार ?

जैसलमेर. 12वीं शताब्दी में 150 फीट लम्बी और 750 फीट चौड़ी तिकोनाकार पहाड़ी पर निर्मित जैसलमेर के सोनार दुर्ग में प्रवेश और निकासी के लिए वैकल्पिक राह निकालने के मार्ग में पुरातत्व एवं सर्वेक्षण विभाग की नामंजूरी किसी दिन बड़े हादसे का कारण बन सकती है। भूकम्प जैसी किसी प्राकृतिक आपदा या पर्यटन सीजन के चरम पर रहने के दौरान हजारों लोगों के एक साथ दुर्ग में चढऩे और उतने के समय वाली परिस्थितियों में भगदड़ से लेकर किसी का दम घुटने जैसी अप्रिय घटनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसा नहीं है कि, सोनार दुर्ग से वैकल्पिक मार्ग निकालने को लेकर कभी प्रशासनिक और तकनीकी उच्च स्तर पर सोचा नहीं गया हो लेकिन हर बार पुरातत्व विभाग ऐसे किसी नवाचार को स्वीकृति देने से साफ इनकार कर उन प्रयासों को सिरे से खारिज कर देता रहा है।
हड़बड़ी में न हो जाए गड़बड़ी
गत दिनों जब दीपावली के ठीक अगले दिन से लगातार चार-पांच दिनों तक गुजराती और अन्य प्रांतों सेे आए हजारों देशी सैलानियों व सैकड़ों विदेशी पर्यटक सुबह के समय दुर्ग पहुंचे तब उन्हें पैदल जाम में फंस कर रह जाना पड़ा। उतरने-चढऩे का एक ही मार्ग होने से हजारों लोग दुर्ग की चार प्रोलों वाले घाटीदार रास्ते में चींटियों की चाल से रेंगने को विवश हो गए। उस समय अगर किसी कारण से फिसलन भरी घाटी में भगदड़ या किसी का स्वास्थ्य बिगडऩे वाली घटना हो जाती तब उससे निपटने का कोई रास्ता फिर नहीं रह जाता। यही कारण है कि एक बार फिर दुर्ग में निवास करने वाले करीब साढ़े तीन हजार लोगों व सैलानियों के बीच वैकल्पिक मार्ग का मसला चर्चा में आ गया।
जिंदगी पर भारी नियमों की बाध्यता
दरअसल सोनार दुर्ग आजादी के बाद पुरातत्व विभाग के संरक्षित स्मारकों में शामिल है। दुर्ग के मौलिक सौन्दर्य को बनाए रखने के लिए विभाग ने कई पाबंदियां लाद रखी हैं। इसी वजह से सैकड़ों साल प्राचीन चार प्रोलों वाले एकमात्र रास्ते के साथ एक और नया मार्ग बनाने की किसी भी सिफारिश को पुरातत्व विभाग स्वीकार नहीं करता। यहां यह शोचनीय सवाल है कि, विभाग के नियम जब बने तब इतनी बड़ी तादाद में दुर्ग में सैलानियों की आवक के बारे नहीं सोचा गया था। यह वह दौर था, जब दुर्ग में भी बमुश्किल हजार लोग निवास करते थे और वहां व्यावसायीकरण नाममात्र का था। अब सारा परिदृश्य बदल चुका है। ऐसे में इंसानी जानों पर नियमों को तरजीह देना कितना उचित है?
अब तक हुए प्रयास
- वर्षों पहले राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने दुर्ग में करीब साढ़े तीन हजार की आबादी और दर्जनों होटल्स, गेस्ट हाऊस व हजारों पर्यटकों की आवाजाही आदि के मद्देनजर दुर्ग के दक्षिण-पूर्वी हिस्से से 99 सीढिय़ों वाले वैकल्पिक मार्ग की जरूरत जता चुका है।
- इसकी प्रत्येक सीढ़ी डेढ़ मीटर चौड़ी और छह इंच मोटाई वाली होनी थी।
- केंद्र सरकार की तरफ से जैसलमेर के नियुक्त सचिव सुधांश पंत के निर्देशानुसार जिला प्रशासन ने पुरातत्व विभाग को वैकल्पिक मार्ग निर्माण की स्वीकृति के लिए पत्राचार किया था। जिसे विभाग ने ठुकरा दिया।
- बॉम्बे आइआइटी के छात्रों ने भी एक शोध में बताया था कि भूकम्प आने के लिहाज से जैसलमेर का सोनार दुर्ग संवेदनशील क्षेत्र में है।
- दुर्ग में साल 2001 की 26 जनवरी को आए तेज गति वाले भूकम्प से प्राचीन इमारतों को नुकसान पहुंचा था।
- भविष्य में भूकम्प के कारण अगर एकमात्र मार्ग बंद हो जाए तो स्थानीय लोगों व अन्य तक बचाव व राहत पहुंचाना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

फैक्ट फाइल -
- 1156 में दुर्ग का निर्माण शुरू हुआ
- 99 बुर्ज बनाए गए सोनार दुर्ग में
- 04 प्रोलों से होकर गुजरता है दुर्ग का रास्ता