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लेटलतीफी का जीवंत स्मारक बना जैसलमेर का टाउन हॉल, तीसरी बार जारी टेंडर को निरस्त किया

जैसलमेर शहर में विकास के नाम पर वर्षों से चल रही ढिलाई और अव्यवस्था के साथ लेटलतीफी का सबसे बड़ा उदाहरण अगर किसी एक परियोजना को कहा जाए, तो वह निश्चित रूप से डेडानसर मैदान के पास चल रहा टाउन हॉल का निर्माण कार्य है।

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जैसलमेर शहर में विकास के नाम पर वर्षों से चल रही ढिलाई और अव्यवस्था के साथ लेटलतीफी का सबसे बड़ा उदाहरण अगर किसी एक परियोजना को कहा जाए, तो वह निश्चित रूप से डेडानसर मैदान के पास चल रहा टाउन हॉल का निर्माण कार्य है। करीब 13 साल पहले बड़े सपनों और दावों के साथ शुरू किया गया यह प्रोजेक्ट आज भी अधूरा पड़ा है और गत फरवरी माह में इसे पूरा करने के लिए तीसरी बार टेंडर निकाला गया। पत्रिका पड़ताल में यह बात सामने आई है कि स्वायत्त शासन विभाग ने इस टेंडर पर रोक लगाते हुए प्रक्रिया को निरस्त कर दिया है।

साथ ही उसी ठेकेदार से काम करवाने को कहा है, जिसके पास पूर्व में यह काम था। इससे पहले गत वर्ष 31 दिसम्बर को कार्य में ढिलाई बरतने के चलते टाउन हॉल निर्माण का ठेका निरस्त कर दिया था और गत 12 फरवरी को नगरपरिषद की ओर से करीब 15.17 करोड़ रुपए की राशि से टाउन हॉल के बकाया कार्य को पूरा करवाने का टेंडर जारी किया था। इसके तहत 6 मार्च तक निविदाएं आमंत्रित की गई थी। नगरपरिषद सूत्रों ने बताया कि जिस ठेकेदार का कार्य निरस्त किया गया था, उसने विभाग में अपील की और उस पर स्वायत्त शासन विभाग ने टेंडर प्रक्रिया को निरस्त करने का निर्देश जारी किया।

लागत बढ़ी और इंतजार भी लम्बा हुआ

गौरतलब है कि वर्ष 2013 में जैसलमेर शहर में टाउन हॉल निर्माण की जिस परियोजना को शहर के सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बनाने की योजना थी, वह शुरुआत से किसी न किसी प्रकार के विवादों के साये में रही है। पहले इसका शिलान्यास तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से उस जगह करवाया गया, जहां आज मंगलसिंह पार्क है। इस स्थान के सोनार दुर्ग से नजदीक होने पर एएसआइ ने आपत्ति जताई, तब नगरपरिषद ने इसके लिए डेडानसर मैदान के पास स्थान चिन्हित किया। शुरुआत में यह भवन 13 करोड़ की लागत से पूरा करवाया जाना था, आज उस पर करीब 11 करोड़ रुपए खर्च हो गए और अब भी करीब 16 करोड़ का काम बाकी है। साल 2019 में टाउन हॉल के लिए अतिरिक्त कार्य करवाने के लिए 19.53 करोड़ रुपए की बजट घोषणा की। काम करने वाले ठेकेदार से विवाद चलने के बाद और अन्य कारणों से 4 साल बाद टेंडर निकाला गया। नए ठेकेदार ने 5 अक्टूबर 2024 को काम शुरू किया और उसे 28 अक्टूबर 2025 तक काम पूरा करना था। लेकिन कार्य करने में ढिलाई बरते जाने के बाद नगरपरिषद ने 31 दिसम्बर 2025 को उसका ठेका निरस्त कर दिया।

इन कारणों से पूरा नहीं हुआ काम

पहले दो टेंडरों के बावजूद काम पूरा नहीं हो पाया है तो इसके पीछे साफ तौर पर नगरपरिषद की तरफ से मोनेटरिंग में बरती गई ढिलाई मुख्यत: जिम्मेदार है। ठेकेदार ने भी काम में देरी की। समय-समय पर बदलती प्राथमिकताओं के कारण निर्माण कार्य बार-बार अटकता रहा। न तो जिम्मेदार अधिकारियों ने सख्ती दिखाई और न ही समय रहते कोई प्रभावी कार्रवाई की गई। परिणामस्वरूप, आज भी यह भवन अधूरा खड़ा है और शहरवासियों को करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद इसका कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। अब जबकि तीसरी बार टेंडर जारी किए जाने के बाद वह निरस्त कर दिया गया है तो सवाल यही उठता है कि क्या इस बार भी लेटलतीफी की वही कहानी दोहराई जाएगी? पिछले अनुभवों को देखते हुए लोगों में भरोसे की कमी साफ नजर आ रही है। शहर के बुद्धिजीवी और आमजन इस पूरे मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस परियोजना की निगरानी किस स्तर पर हुई? अगर समय पर काम पूरा नहीं हुआ तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

टेंडर पर लगाई गई है रोक

टाउन हॉल के बकाया कार्य संबंधी टेंडर पर डीएलबी की ओर से रोक लगाई गई है। उसी ठेकेदार से काम करवाने का निर्देश है। उच्चस्तरीय आदेशों की पालना में कार्य जल्द करवाया जाएगा।

- लजपालसिंह, आयुक्त, नगरपरिषद जैसलमेर