8 नवंबर 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

न जान, न पहचान, फिर भी रक्तदान से जीवनदान

-जिला अस्पताल में हर माह 60 से 70 यूनिट रक्त की जरुरत-सोशल मीडिया पर बस एक मैसेज और हाजिर दर्जनों रक्तदाता-कोरोना को लेकर भय भी नहीं हिला सका जज्बा
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

जैसलमेर

•

image

Deepak Vyas

•

Updated: 1 Oct 2020, 9:26 AM IST

न जान, न पहचान, फिर भी रक्तदान से जीवनदान

न जान, न पहचान, फिर भी रक्तदान से जीवनदान

जैसलमेर. न तो जान-पहचान और न ही कोई रक्त संबंध, फिर भी रक्तदान देकर जीवन देने की स्वस्थ परंपरा सरहदी जिले में शुरू हो चुकी है।
जन्म दिन को यादगार बनाना हो या किसी अपनो को श्रद्धांजलि देने का भाव..। किसी के प्राणों पर संकट हो या फिर स्वेच्छा से गोपनीय रूप से सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्वहन..। यह सुखद स्थिति सरहद के उसे जिले में नजर आने लगी है। इन सबके बीच समय-समय पर संगठनों की ओर से किसी विशेष अवसर पर रक्तदान शिविर का आयोजन किया जाता रहता है।
सरहदी जिले में जागरुकता का अलाम यह है कि स्वैच्छिक रक्तदान के लिए पुुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं व बालिकाएं भी उत्साहपूर्वक सामाजिक सरोकार के इस कार्य में भागीदारी कर रही है। अब वे दिन बीत गए जब जिला मुख्यालय के जिस राजकीय जवाहर अस्पताल में हर समय रक्त का टोटा नजर आता था, वहीं अब कई यूनिट रक्त जमा ही रहता है। सरकारी-गैरसरकारी स्तर पर सतत प्रयासों और शिक्षा व सोशल मीडिया के प्रचार-प्रसार का ही यह परिणाम है कि जैसलमेर जैसे पिछड़े माने जाने वाले इलाके में भी रक्तदान को लेकर पूर्व के दशकों तक चलने वाली भ्रांतियां अब टूटने लगी है। यहां राजकीय जवाहर चिकित्सालय के रक्त बैंक में अब हर वक्त रक्त उपलब्ध रहने लगा है। सोशल मीडिया पर केवल एक मैसेज मात्र से ही तुरंत रक्तदाता तुरंत पहुंच जाते हैं। कुछ रक्तदान तो ऐेसे भी हैं जो रक्तदान किए जाने के तीन माह होते ही अस्पताल पहुंच जाते हैं। कई लोग ऐसे भी हैं जो अपने मोबाइल में रिमाइंडर लगा कर रखते हैं।
भय पर भारी जज्बा
कोरोना महामारी के दौरान कठिन समय में भी जैसलमेर के स्वैच्छिक रक्तदाताओं ने वक्त पर रक्त पहुंचाकर आवश्यकता वाले मामलों में जागरुकता व मानवीयता का परिचय दिया। यही नहीं कोविड.़१९ के दौरान कई समाजों व संगठनों ने सोशल डिस्टेंसिंग की पालना करते हुए रक्तदान शिविरों का आयोजन करवाया भी करवाया। ऐसे में ब्लड बैंक में रक्त की उपलब्धता बनी रही।
24 वर्ष पहले स्थापित हुई थी ब्लड बैंक
जिला मुख्यालय स्थित जवाहर चिकित्सालय में वर्ष १९९६ में ब्लड बैंक की स्थापना के बाद रक्तदान का जज्बा खूब बढ़ा है। आज स्थिति यह है कि मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर जरूरतमंदों को रक्त उपलब्ध कराने को लेकर मैसेज मिलते ही दर्जनों लोग हाजिर हो जाते हैं। सुखद बात यह भी है कि कम मात्रा में उपलब्ध होने वाले ग्रुप के खून की व्यवस्था भी समय रहते हो जाती है। जैसलमेर में ऐसे अनेक रक्तदाता हैं, जो मोबाइल से मिलने वाले एक कॉल पर अथवा सोशल मीडिया के एक संदेश को पढ़कर जवाहर चिकित्सालय स्थित ब्लड बैंक पहुंच जाते हैं। महिला वर्ग भी हिचक तोड़ कर परमार्थ का यह कार्य करने में आगे आ रहा है।