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हाळी अमावस्या के दिन किसानों ने हल चलाकर किया भूमि पूजन

पश्चिमी राजस्थान के किसानों का आपसी भाइचारे व सद्भाव का अक्षय तृतीया का तीन दिवसीय पर्व रविवार को हाळी अमावस्या के साथ शुरू हुआ।

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पश्चिमी राजस्थान के किसानों का आपसी भाइचारे व सद्भाव का अक्षय तृतीया का तीन दिवसीय पर्व रविवार को हाळी अमावस्या के साथ शुरू हुआ। इस मौके पर लोगों ने अपने घरों में गेहूं, बाजरे का खीच व मूंग-चावल का भोजन बनाकर सेवन किया और अच्छी बारिश व सुख समृद्धि के लिए एक-दूसरे को शुभकामनाएं दी। हाळी अमावस्या के दिन रविवार को विशेषकर किसान वर्ग ने अपने खेतों में जाकर सूखे में हल चलाने की रस्म अदा की व धरती माता की पूजा कर अच्छी बारिश के लिए सुगन विचार किए। रविवार को गांवों में जगह-जगह किसानों ने खीच का भोजन किया व एक-दूसरे को अक्षय तृतीया के पर्व की शुरुआत पर बधाइयां दी। उल्लेखनीय है कि पश्चिमी राजस्थान के किसानों का मुख्य पर्व अक्षय तृतीया है। रबी की फसल के खलिहानों में आ जाने के बाद किसानों की ओर से पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। हाळी अमावस्या के बाद मंगलवार को आखाबीज व बुधवार को आखातीज का पर्व भी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। इस मौके पर लोग गेहूं, बाजरी के आखे दानों को उबालकर उसका खीच, आखी बडिय़ों, ग्वार फलियों व काचरी की सब्जी बनाकर उसी भोजन का सेवन करते है।

खेती का आगाज करने की तैयारियों में जुटे किसान

रामदेवरा क्षेत्र में वैशाख मास की अमावस्या को हाळी अमावस्या के रूप में हर्षोल्लास के साथ रविवार को मनाया गया। आने वाले फसलों के मौसम को लेकर बरसात के शगुन देखे गए, वहीं सभी लोगों ने स्नेह मिलन के साथ एक दूसरे को हाळी अमावस्या की बधाई दी। अबूझ सावों का त्योहार कहे जाने वाले आखातीज का महत्व केवल शादियों से ही नहीं है, बल्कि रामदेवरा क्षेत्र सहित समूचे मारवाड़ के किसानों के लिए भी आखातीज का बड़ा महत्व है। इस दिन किसान अपने-अपने खेतों में पहुंचकर नए साल की खेती-बाड़ी का शुभारंभ करते हैं। इसके लिए किसानों का यह तीन दिवसीय आखातीज का त्योंहार आमतौर पर हाळी अमावस्या से ही शुरू हो जाता है। इस दिन से किसान कृषि यंत्रों की पूजा से लेकर खेती के लिए शगुन लेने का काम भी शुरू कर देते हैं। रविवार को भी रामदेवरा सहित क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों में हाळी अमावस्या का पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया गया और इस दिन किसानों ने घरों में खीच-गळवानी आदि बनाकर नए साल की खेती के शगुन लेने भी शुरू किए। किसानों ने विशेषकर अपने बच्चों के हाथों से खेतों में प्रतीकात्मक हल चलवाकर खेती व अच्छे जमाने के शगुन लिए।