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धोरों में पल रही पंगेशियस मछलियां: किसानों को हो रही आय, मिट्टी की भी बढ़ रही गुणवत्ता

सरहदी जिला रेत के धोरों के बीच बसा हुआ है। इस रेगिस्तानी जिले में मछली पालन करना किसी चुनौती से कम नहीं है। ऐसी ही चुनौती स्वीकार कर धोरों के बीच मछली पालन किया जा रहा है। क्षेत्र के बांधेवा गांव में प्रगतिशील किसान खेती के साथ ही मछली पालन कर रहे है।

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सरहदी जिला रेत के धोरों के बीच बसा हुआ है। इस रेगिस्तानी जिले में मछली पालन करना किसी चुनौती से कम नहीं है। ऐसी ही चुनौती स्वीकार कर धोरों के बीच मछली पालन किया जा रहा है। क्षेत्र के बांधेवा गांव में प्रगतिशील किसान खेती के साथ ही मछली पालन कर रहे है। उनकी ओर से पंगेशियस मछली का उत्पादन किया जा रहा है। सरहदी जिले में भीषण गर्मी सबसे ज्यादा पड़ती है। इसी के चलते किसान पंगास मछली का पालन आसानी से कर सकते है। सर्दी की बजाय गर्मी के मौसम में पंगास मछली की वृद्धि तेजी से होती है। पंगास का संचयन गर्मी के शुरुआत में करना अच्छा होता है, ताकि गर्मी में संचयन व पालन कर सर्दी के मौसम में बाजार में बिक्री की जा सके। यह मछली कम समय में तैयार होती है और मुनाफा ज्यादा देती है। इस कारण किसान इस मछली को ज्यादा पसंद करते है।

यह है विशेषताएं

- पंगास मछली मीठे पानी में पलने वाली दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी प्रजाति है। यह छह से आठ महिनों में एक से डेढ़ किलो तक हो जाती है।

- वायुश्वासी होने से कम घुलित ऑक्सीजन को सहन करने की क्षमता रखती है।

- भारत में आंध्रप्रदेश पंगास का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है।

- अन्य मछलियों की तुलना में इसमें पतले कांटे कम होते है।

- इस मछली की मांग सबसे ज्यादा है।

- यह मछली रोगों से लडऩे की क्षमता अधिक रखती है।

इस प्रकार कर सकते है पालन

पंगास मछली पालन के लिए संचयन तालाब का आकार 400 वर्गमीटर तक अच्छा माना जाता है। इसमें एक लाख मछलियों का पालन किया जा सकता है। तालाब में पानी की गहराई दो से तीन मीटर तक होनी चाहिए। अधिक गहराई वाले तालाब उपयुक्त नहीं है। क्योंकि पंगास वायुश्वासी होने से बार-बार सतह पर आकर ऑक्सीजन लेती है। ज्यादा गहराई होने से उनकी वृद्धि दर कम हो जाती है। पंगास की अच्छी वृद्धि और उनके अच्छे स्वास्थ्य के लिए पानी का पीएच 6.5-7.5, लवणता 2 पीपीटी से कम और क्षारीयता 40-200 पीपीएम होनी चाहिए।

दिन में दो-तीन बार दें आहार, मिट्टी की बढ़ती है गुणवत्ता

पंगेशियस मछली की प्रारंभिक अवस्था में दो-तीन बार आहार दिया जाता है और बाद में धीरे-धीरे वजन बढऩे पर आहार की मात्रा कम कर दी जाती है। काई व घोंघे इसका प्रमुख आहार है। प्राकृतिक भोजन की उपलब्धता अच्छी हो तो पूरक आहार में खर्च कम होता है। आहार में अधिक प्रोटीनयुक्त पदार्थ का उपयोग किया जाता है। इसी प्रकार एकल खेती में 15-20 ग्राम की एक लाख अंगुलिकाओं को 400 वर्गमीटर संचयन करने से 7-8 माह में 60-65 टन तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। सर्दी के मौसम में तापमान 15 डिग्री से कम होने पर मछली तनाव में आ जाती है और खाना कम कर देती है। जिससे वजन कम हो जाता है। ऐसे में अक्टूबर माह तक मछली की निकासी कर लेनी चाहिए। तालाब के पानी को खेत में देने से मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होता है और फसल का उत्पादन भी बढ़ जाता है।

लागत कम, लाभ ज्यादा

मछली पालन में तालाब के अलावा किसान को पानी व आहार पर खर्च करना पड़ता है। इसमें लागत व लाभ का अनुपात 1:3 रहता है। पंगास की डिमांड भी अधिक रहती है। इसलिए पंगास पालन से अच्छी कमाई हो जाती है। प्रगतिशील किसान खेलाणा निवासी बीरबलखां व बांधेवा निवासी हाजी हसनखां ने बताया कि वे पंगास मछली का पालन कर रहे है। मछली का वजन एक से डेढ़ किलो है। जिसकी बिक्री यहीं फार्म पर ही हो जाती है। कम जगह व लागत में अच्छा मुनाफा हो रहा है। साथ ही लोगों को भी सस्ती व ताजा मछली मिल रही है। गर्मी के मौसम में खेती करना मुश्किल हो जाता है। इस कारण मछली पालन व्यवसाय शुरू किया और इससे लाभ मिल रहा है।

पोषक तत्वों से भरपूर है पंगास

कृषि विज्ञान केन्द्र पोकरण के पशुपालन वैज्ञानिक डॉ.रामनिवास ने बताया कि पंगेशियस मछली में रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। कम समय में वजन अधिक बढ़ता है। जिससे किसान इसे अपना रहा है। खाने में पोषक तत्वों से भरपूर होने के साथ यह स्वादिष्ट भी है।

आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे किसान

क्षेत्र का वातावरण मछली अनुकूल होने के कारण किसान इसमें रुचि दिखा रहा है। खेती के साथ मछली पालन करने से आर्थिक रूप से भी किसान मजबूत हो रहे है। साथ ही जिले में युवाओं को रोजगार के नए अवसर प्राप्त होने लगे है।

  • डॉ.दशरथप्रसाद, अध्यक्ष कृषि विज्ञान केन्द्र, पोकरण