24 मार्च 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

बरसाती पानी का संग्रहण ही बनेगा भविष्य का सबसे बड़ा आधार

जानकारों के मुताबिक यदि इस जल का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाए, तो यह सिंचाई और पेयजल दोनों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। वर्तमान में इस दिशा में ठोस और दीर्घकालिक प्रयासों की कमी साफ दिखाई देती है।

2 min read
Google source verification

मरुस्थलीय क्षेत्र जैसलमेर में समस्या केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि उपलब्ध संसाधनों के समुचित प्रबंधन के अभाव में स्थिति और गंभीर बन रही है। एक ओर लोग पेयजल के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हर वर्ष बरसात का बड़ा हिस्सा बिना उपयोग के बहकर नष्ट हो जाता है।

काकनय और अन्य नदियों के जल का उपयोग बन सकेगा कारगर

क्षेत्र में काकनय, काहला और चांदन इलाकों से बहने वाला बरसाती पानी विशाल रिण क्षेत्रों में जमा होकर अंततः वाष्प बनकर उड़ जाता है। जानकारों के मुताबिक यदि इस जल का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाए, तो यह सिंचाई और पेयजल दोनों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। वर्तमान में इस दिशा में ठोस और दीर्घकालिक प्रयासों की कमी साफ दिखाई देती है। जल विशेषज्ञों का मानना है कि जल संकट से निपटने के लिए पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीकों का समन्वय बेहद आवश्यक है। पहले के समय में तालाब, खड़ीन, बावड़ी और छोटे बांध जल संरक्षण के प्रभावी साधन थे, जिनसे मरुस्थल में भी जीवन संभव हुआ। समय के साथ इन संसाधनों की उपेक्षा होने लगी, जिससे संकट गहराता गया। यदि खेतों में मेड़बंदी, छोटे बांधों का निर्माण और वर्षा जल संग्रहण को अनिवार्य बनाया जाए, तो स्थिति में सुधार संभव है।

तालाब, खड़ीन, बांधों के पुनर्जीवन से घट सकेगा जल संकट

इसके साथ ही पुराने तालाबों और खड़ीनों का जीर्णोद्धार भी जरूरी है, ताकि अधिकतम पानी को रोका और संचित किया जा सके। किसानों को टांके और छोटे जलाशय बनाने के लिए प्रोत्साहित करना भी एक प्रभावी कदम साबित हो सकता है।

एक्सपर्ट व्यू :बेहतर जल प्रबंधन से हो सकेगी मरुस्थल में समृद्धि

इतिहासवेत्ता ऋषिदत्त पालीवाल का कहना है कि सरकारी स्तर पर योजनाओं का क्रियान्वयन मजबूत होना जरूरी है। जल संरक्षण के लिए आर्थिक सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाए, ताकि आमजन भी इसमें सक्रिय भागीदारी निभा सके। केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनका जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन ही वास्तविक बदलाव ला सकता है। जल प्रबंधन सही तरीके से किया जाए, तो मरुस्थल में भी समृद्धि संभव है। आज आवश्यकता इस बात की है कि जल संरक्षण को केवल नीतियों तक सीमित न रखकर व्यवहार में उतारा जाए।