
मरुभूमि की तपती रेत पर बसे स्वर्णनगरी के मंदिरों में इन दिनों एक नया दृश्य देखने को मिल रहा है। लोक आस्था की परंपराओं में रमे ये मंदिर अब विदेशी सैलानियों की श्रद्धा के केंद्र बनते जा रहे हैं। दुर्ग परिसर से लेकर गड़ीसर के घाटों तक, हर धार्मिक स्थल पर विदेशी चेहरे भाव-विभोर नजर आते हैं।
सोनार दुर्ग के लक्ष्मीनाथ मंदिर की सुबह की आरती हो या गड़ीसर झील किनारे स्थित गज मंदिर की सजीवता — विदेशी सैलानी मंत्रोच्चार और घंटियों की ध्वनि में न सिर्फ भागीदारी निभा रहे हैं, बल्कि ध्यान और साधना में भी डूब रहे हैं। परंपराओं की इस धूप-दीप भरी दुनिया में वे कुछ ऐसा तलाशते हैं, जो उनकी आत्मा को स्पर्श कर जाए।
कपड़ों से भाषा तक अपनाई संस्कृति
राजस्थानी साफा और ओढऩी में सजे कुछ पर्यटक मंदिर प्रांगण में बैठे मिले। स्थानीय पुजारियों से वे पूजा की विधि, देवी-देवताओं के अर्थ और पर्वों की कहानी सुन रहे थे। कुछ ने 'प्रणाम', 'धन्यवाद' जैसे शब्दों का प्रयोग कर भाषा के माध्यम से भी आत्मीयता जताई।
ये पर्यटक केवल देखने नहीं आए, वे जानना चाहते हैं — यह संस्कृति कैसे जीती है? इन देवस्थलों में वह कौन सी शक्ति है जो इतनी दूर से उन्हें खींच लाई? वे कहते हैं, यह केवल यात्रा नहीं, एक आत्मिक अनुभव है।
विदेशी सैलानियों की जुबानी:
जर्मनी से आई सोफिया बताती है कि आरती के समय मैंने आंखें मूंद लीं… जैसे किसी ऊर्जा से जुड़ गई हूं। इटली निवासी लुका का कहना है कि मंदिरों में सिर्फ मूर्तियां नहीं, जीवन है, भावनाएं हैं। ऑस्ट्रेलिया से आई एमिली का कहना है कि ध्यान करते समय एक गहराई का अनुभव हुआ, जो मेरे देश में मुश्किल है।
-हर साल जैसलमेर में 60 हजार से अधिक विदेशी पर्यटक आते हैं।
-जैन मंदिर, लक्ष्मीनाथ मंदिर, स्वांगिया माता मंदिर, रामदेवरा जैसे स्थल अब धार्मिक पर्यटन स्थल
Published on:
05 Apr 2025 11:36 pm
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