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रुआंसी हुई रसोई, सिलेंडर फिर महंगा, फिर बिगड़ा घरेलू बजट

यह बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब शहर और ग्रामीण इलाकों के परिवार पहले से ही बढ़े बिजली बिल, पेयजल व्यवस्था पर अतिरिक्त खर्च और महंगे परिवहन का दबाव झेल रहे हैं। पहली नजर में 29 रुपए की वृद्धि मामूली लग सकती है, लेकिन इसका असर मासिक और वार्षिक खर्च के स्तर पर कहीं बड़ा है।

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सिलेंडर महंगा होने से घरेलू बजट पर बढ़ा अतिरिक्त आर्थिक दबाव।

रेगिस्तान में इस समय केवल गर्मी ही रिकॉर्ड नहीं बना रही, बल्कि आम व्यक्ति के घरेलू खर्च भी लगातार नए स्तर छू रहे हैं। एलपीजी सिलेंडर की कीमत में 29 रुपए की ताजा बढ़ोतरी ने आम परिवारों की रसोई का बजट फिर झटका दिया है। जैसलमेर में घरेलू गैस सिलेंडर 935 रुपए से बढ़कर 964 रुपए का हो गया है। वाणिज्यिक सिलेंडर भी 3168 रुपए से बढ़कर 3179 रुपए पहुंच गया है। गौरतालब है कि मार्च 60 रुपए की वृद्धि हुई थी। अब जून में 29 रुपए और जुड़ गए। यानी केवल तीन महीनों में घरेलू सिलेंडर 89 रुपए महंगा हो चुका है। यह बढ़ोतरी ऐसे समय हुई है जब शहर और ग्रामीण इलाकों के परिवार पहले से ही बढ़े बिजली बिल, पेयजल व्यवस्था पर अतिरिक्त खर्च और महंगे परिवहन का दबाव झेल रहे हैं। पहली नजर में 29 रुपए की वृद्धि मामूली लग सकती है, लेकिन इसका असर मासिक और वार्षिक खर्च के स्तर पर कहीं बड़ा है। यदि कोई परिवार साल भर में 12 सिलेंडर उपयोग करता है तो मार्च से पहले की तुलना में उसे लगभग 1068 रुपए अतिरिक्त खर्च करने होंगे। यह राशि एक महीने की स्कूल फीस, बिजली बिल के बड़े हिस्से या कई दिनों की सब्जी-राशन खरीद के बराबर बैठती है। ग्रामीण क्षेत्रों में एलपीजी उपयोग बढ़ने के बाद गैस कीमतों में हर बदलाव सीधे घरेलू बजट में दर्ज होता है। पहले जहां ईंधन विकल्प उपलब्ध थे, अब अधिकांश परिवार गैस पर निर्भर हैं।

आंकड़ों में समझिए बढ़ता दबाव

-मार्च से पहले घरेलू सिलेंडर : 875 रुपए

-मार्च वृद्धि : 60 रुपए

- जून वृद्धि : 29 रुपए

-वर्तमान कीमत : 964 रुपए

-कुल बढ़ोतरी : 89 रुपए

बढ़ोतरी प्रतिशत : लगभग 10.2 प्रतिशत

जैसलमेर पर असर ज्यादा क्यों?

जैसलमेर की अर्थव्यवस्था और भौगोलिक परिस्थितियां इसे अन्य जिलों से अलग बनाती हैं। अधिकांश वस्तुएं सैकड़ों किलोमीटर दूर से यहां पहुंचती हैं। ईंधन महंगा होने का मतलब है परिवहन लागत बढ़ना और परिवहन महंगा होने का मतलब है बाजार में सामान का और महंगा होना। यह वृद्धि सामान्य महंगाई दर से कहीं अधिक गति को दर्शाती है। ऊर्जा क्षेत्र में होने वाली ऐसी बढ़ोतरी का प्रभाव अक्सर आने वाले महीनों में अन्य वस्तुओं की कीमतों में भी दिखाई देता है। ऊर्जा क्षेत्र में होने वाली हर वृद्धि यहां दोहरे असर के रूप में महसूस होती है।बिजली की बढ़ती खपत, पानी की व्यवस्था पर अतिरिक्त खर्च और अब महंगा सिलेंडर—इन तीनों ने मिलकर घरेलू बजट का संतुलन चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

महंगाई की पूरी चेन

-एलपीजी महंगी

-परिवहन महंगा

-व्यापारिक लागत बढ़ी

-उपभोक्ता वस्तुएं महंगी

-घरेलू बचत घटी

सबसे प्रभावित वर्ग

-मध्यमवर्गीय परिवार

- सीमित वेतन वाले कर्मचारी

- छोटे व्यापारी

-किराएदार परिवार

-ग्रामीण उपभोक्ता

-उज्ज्वला कनेक्शन उपयोगकर्ता

महंगाई का सबसे ज्यादा असर मध्यमवर्गीय परिवारों पर

वेतन लगभग स्थिर है, लेकिन रोजमर्रा के खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। पेट्रोल महंगा हुआ तो आने-जाने का खर्च बढ़ा, बिजली बिल पहले से ज्यादा आ रहा है और अब गैस सिलेंडर भी महंगा हो गया। तीन-चार महीने में बार-बार बढ़ती कीमतों से बचत प्रभावित हो रही है। परिवार की जरूरतें पूरी करने के बाद बहुत कम राशि बच पाती है। महंगाई का सबसे ज्यादा असर मध्यमवर्गीय परिवारों पर पड़ रहा है, क्योंकि आय और खर्च के बीच का अंतर लगातार कम होता जा रहा है।

- महेंद्रसिंह, निजी कर्मचारी

मासिक बजट संभालना मुश्किल

पहले से ही बिजली, दूध, सब्जी और बच्चों की पढ़ाई का खर्च लगातार बढ़ रहा है। अब गैस सिलेंडर फिर महंगा होने से मासिक बजट संभालना मुश्किल हो रहा है। हर महीने खर्चों की नई सूची बनानी पड़ती है और कई गैर-जरूरी चीजों पर कटौती करनी पड़ रही है। गैस की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर सीधे रसोई पर पड़ता है, क्योंकि इसके बिना कोई विकल्प नहीं है। आम परिवारों के लिए यह अतिरिक्त बोझ चिंता बढ़ाने वाला है।

-सीमा शर्मा,गृहिणी

एक्सपर्ट व्यू: ऊर्जा क्षेत्र की कीमतें तय करती है अर्थव्यवस्था की बेस कॉस्ट

ऊर्जा क्षेत्र की कीमतें किसी भी अर्थव्यवस्था की बेस कॉस्ट तय करती हैं। पेट्रोल, डीजल और एलपीजी महंगे होने का असर धीरे-धीरे हर उत्पाद और सेवा में दिखाई देता है। सीमावर्ती और दूरस्थ जिलों में यह प्रभाव और अधिक तीव्र होता है, क्योंकि परिवहन लागत पहले से ही ऊंची रहती है। यदि आगामी महीनों में ऊर्जा कीमतों में और बढ़ोतरी होती है तो खाद्य महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है।

- यशोवर्धन जोशी, ऊर्जा विश्लेषक