
थार के रेगिस्तानी परिदृश्य में फैली जैसलमेर की सरहद पर भारतीय थल सेना हर पल सतर्क रहती है। विशाल रेगिस्तान, तेज़ धूप और ऊंची रेत की ढूहों के बीच सैनिक चौकसी, निगरानी और तत्पर कार्रवाई में लगे रहते हैं। पाक से सटी जैसलमेर की पश्चिमी सरहद लंबी, खुली और रेतीली है। लॉन्ग-रेंज सर्विलांस, थर्मल इमेजिंग, मोबाइल वॉच टावर, माइन्स फील्ड, बीओपी और क्विक रिएक्शन टीम लगातार एक्टिव रहती हैं। रेगिस्तान में दुश्मन की मूवमेंट को पकड़ना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन आधुनिक तकनीक इसे संभव बनाती है। युद्धकाल में टैंक कॉलम, तोपखाने और मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री को तेजी से मोर्चे पर पहुंचाने का नियमित अभ्यास होता है।
सेना और सीमावर्ती गांवों के लोग दशकों से भरोसेमंद साझेदार रहे हैं। स्वास्थ्य, सुरक्षा और परिवहन में मदद, आपदा राहत और बाढ़-सूखा जैसी परिस्थितियों में बचाव कार्य से यह भरोसा मजबूत हुआ है।
टी -90 भीष्म, टी -72 M1 अजया, बी एमपी -2, के -9 वज्र, पिनाका, धनुष हॉवित्जर, यूएवी-ड्रोन और एंटी टैंक मिसाइल जैसे उपकरण यहां नियमित अभ्यास में उपयोग होते हैं। नाइट फाइटिंग, लॉजिस्टिक्स, ड्रोन सर्विलांस, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और साइबर सपोर्ट को भी शामिल किया गया है।
1965 और 1971 के युद्धों ने इस क्षेत्र को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाया। आज सरहदी जैसलमेर जिले में आधुनिक तकनीक, संयुक्त कमान और मल्टी-डोमेन ऑपरेशन का प्रशिक्षण पश्चिमी मोर्चों के लिए तैयार सेना का आधुनिक चेहरा पेश करता है।
Published on:
14 Jan 2026 10:01 pm
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