
भाई-बहन के पवित्र बंधन का पर्व रक्षा बंधन जब भी आता है, तो हिन्दू समाज में हर्षोल्लास का माहौल छा जाता है, लेकिन श्री आदि गौड़ वंशीय पालीवाल ब्राह्मण समाज के लिए यह दिन बीते समय के घावों की याद दिलाता है। एक इतिहास जिसने इस समाज की सांस्कृतिक धारा को मोड़ दिया, एक संकल्प जिसने एक पर्व को शोक और प्रतिज्ञा में बदल दिया। इतिहासकार ऋषिदत्त पालीवाल बताते हैं कि पालीवाल ब्राह्मणों का इतिहास राजस्थान के पाली नगर से जुड़ा है, जहां 6वीं सदी से उनका निवास था। यह नगर उनकी समृद्धि का प्रतीक था, जहां की दीवारें संपन्नता की कहानियां सुनाती थीं। पालीवालों की प्रतिष्ठा इतनी थी कि यहां आने वाले हर ब्राह्मण को एक ईंट और एक रूपए का सहयोग देकर वह भी संपन्न बन जाता था, लेकिन समय की आंधी ने इस सुखद जीवन को तहस-नहस कर दिया।
विक्रम संवत 1348 यानी 1291-92 ईस्वी का वह समय था, जब दिल्ली का शासक जलालुद्दीन खिलजी अपनी सेना के साथ पाली नगर पर आक्रमण करने आया। यह वही दिन था, जब पालीवाल ब्राह्मण श्रावणी पूर्णिमा, जो कि रक्षा बंधन का दिन होता है, के लिए तैयार हो रहे थे। पर इस बार राखी के धागे नहीं बंधे, बल्कि हजारों पालीवाल ब्राह्मणों ने अपने जीवन की डोर को मातृभूमि के लिए अर्पण कर दिया।
खिलजी की सेना ने पाली को लूटा, लोगों पर अत्याचार किए, और पानी के एकमात्र तालाब को अपवित्र कर दिया। पालीवालों ने अपनी जान की बाजी लगा दी, लेकिन इस युद्ध में सैकड़ों माताएं और बहनें विधवा हो गईं। पाली की धरती लाल हो गई, और इसी खून से जन्म हुआ उस संकल्प का, जिसने पालीवाल ब्राह्मणों को अपना शहर छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
रक्षा बंधन के दिन हुई इस घटना ने पालीवालों के हृदय को इतना आहत किया कि उन्होंने पाली नगर को सदा के लिए छोड़ने का निर्णय लिया। एक साथ, अपने धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए, पालीवालों ने पाली को त्याग दिया और पूरे भारत में फैल गए। आज भी, पालीवाल ब्राह्मण समाज हर वर्ष श्रावणी पूर्णिमा के दिन पाली नगर के धौला चौतरा पर अपने पूर्वजों के बलिदान को स्मरण करते हुए पुष्पांजली अर्पित करता है। इस दिन, पालीवाल ब्राह्मण पाली के तालाब पर जाकर अपने पूर्वजों का तर्पण करते हैं, लेकिन रक्षा बंधन नहीं मनाते। उनके लिए यह दिन राखी की नहीं, बल्कि उस प्रतिज्ञा की याद दिलाता है, जो 732 साल पहले ली गई थी।
Published on:
18 Aug 2024 11:25 pm
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