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रेगिस्तान में पांव पसार रहे एड्स पर लगाम

-विगत वर्षों में जन-जागृति के प्रयासों से बनी सुखद स्थिति -90 के दशक में जिले में आए घातक रोग के मरीजों की संख्या में अब ठहराव  

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रेगिस्तान में पांव पसार रहे एड्स पर लगाम

रेगिस्तान में पांव पसार रहे एड्स पर लगाम

सरहद से सटे जैसलमेर जिले में कभी तेजी से पांव पसारने वाले एड्स रोग पर अब लगाम लगी है। विगत वर्षों में सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर जन-जागृति के प्रयासों और जिला मुख्यालय पर उपचार की सुविधा शुरू होने से यह सुखद स्थिति बनी है। मौजूदा समय में एड्स अथवा एचआइवी पॉजिटिव मरीजों की संख्या में लगभग ठहराव आ गया है। हकीकत यह है कि एक्वायर्ड इम्युनो डेफिसिएंसी सिंड्रोम (एड्स) का आमूल उपचार देश-दुनिया में चिकित्सा विज्ञानियों के लिए अब तक अनसुलझी पहेली ही बना हुआ है। ऐसे में इससे बचाव को ही सर्वश्रेष्ठ उपचार माना गया। सूत्रों के अनुसार गत वित्तीय वर्ष तक जैसलमेर जिले में एड्स रोगियों की संख्या 195 थी, इस वित्तीय वर्ष में अप्रेल माह से अक्टूबर माह तक एड्स के 14 नए रोगी सामने आए हैं। एड्स के नए मरीजों में 6 पुरुष व 8 महिलाएं शामिल है। गौरतलब यह है कि इन 8 महिला मरीजों में 4 गर्भवती है।

रेगिस्तान में यूं फैला घातक रोग

-जानकारों की मानें तो जैसलमेर जिले में पर्यटन व्यवसाय के चलते इस रोग की शुरूआत हुई। -कामकाज के सिलसिले में बाहर जाने वाले जिले के मूल बाशिंदों में यह रोग फैलने लगा। -एड्स जैसे घातक रोग की शुरुआत जैसलमेर जिले में 1990 के दशक में हो गई थी। -ऊंट सफारी के काम से जुड़े व्यक्तियों के विदेशी महिलाओं के संपर्क में आने से यह रोग प्रसारित हुआ। - कुछ साल पहले राजस्थान विश्वविद्यालय की ओर से किए गए अध्ययन में भी ऊंट सवारों के तेजी से एचआईवी पॉजिटिव होने की जानकारी सामने आई थी। -रोजगार के सिलसिले में जिले से बाहर जाने वाले कई युवक भी एड्स से संक्रमित हो गए।

- इसी वजह से कुछ महिलाएं भी एचआइवी से संक्रमित हो गईं।

एचआइवी जांच की सुविधा

एड्स की प्रारंभिक जांच रक्त के नमूने से होती है। जिस व्यक्ति के रक्त में एचआइवी पॉजिटिव पाया जाता है, वही एड्स से ग्रस्त माना जाता है। जिला अस्पताल में एचआइवी जांच की सुविधा है। यहां पॉजिटिव पाए जाने वाले कैसेज को जोधपुर ई-आरटी रैफर किया जाता है, जहां सीडी-4 जांच के बाद रोगी का उपचार प्रारंभ होता है। रोगियों के लिए सरकार ने जांच से लेकर दवाइयों तक की नि:शुल्क व्यवस्था कर रखी है। एचआइवी पॉजिटिव व्यक्ति के संबंध में पूर्ण गोपनीयता बरती जाती है। जो व्यक्ति एड्स का रोगी चिह्नित होता है, उसकी रिपोर्ट में उसका नाम तक नहीं दिया जाता। इसके स्थान पर संबंधित व्यक्ति के जिस्म विशेषकर चेहरे की पहचान को उभारा जाता है। इसका उद्देश्य यही है कि एड्स रोगियों की पहचान सार्वजनिक न हो और उन्हें किसी तरह की सामाजिक बदनामी का भय नहीं रहे।

फैक्ट फाइल

- 90 के दशक में एड्स की शुरुआत

- 209 मरीज जैसलमेर के मौजूदा समय में ले रहे उपचार

-1981 में चिह्नित हुआ दुनिया का पहला एड्स रोगी

अस्पताल में सुविधाएं उपलब्ध

राजकीय जवाहिर चिकित्सालय में एचआइवी की जांच और एल-ईआरटी सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही है। यहां मरीजों की काउंसलिंग की भी की जाती है।-डॉ. रविन्द्र सांखला, पीएमओ, जवाहर चिकित्सालय, जैसलमेर