
सीमावर्ती जिले में बेरोजगारी अब आंकड़ों की समस्या नहीं रही, यह युवाओं की सोच, दिनचर्या और भविष्य को सीधे निगलती सच्चाई बन चुकी है। रोजगार के अवसर सिमटते ही आत्मविश्वास टूटा और उसी खालीपन में नशे ने जगह बना ली। हालात यह हैं कि कई इलाकों में नशा अब छुपा हुआ अपराध नहीं, बल्कि सामान्य दिनचर्या का हिस्सा बनता जा रहा है।
सबसे बड़ा झटका किशोर वर्ग में दिख रहा है। पढ़ाई छूटते ही अनुशासन टूट रहा है और दिशा खोती जा रही है। स्कूल से बाहर निकलते ही किशोर न तो शिक्षा से जुड़े रह पा रहे हैं और न किसी कौशल से। खाली समय और निराशा का मेल उन्हें तेजी से भटकाव की ओर धकेल रहा है, जहां नशा सबसे आसान रास्ता बनकर सामने आता है।
शहर और कस्बों के खेल मैदान इस बदलाव की खामोश गवाही दे रहे हैं। जो मैदान कभी ऊर्जा और प्रतिस्पर्धा से भरे रहते थे, वहां अब सन्नाटा पसरा है। शाम ढलते ही वही युवा खेल गतिविधियों की जगह नशे के अड्डों पर जुटते नजर आते हैं। यह बदलाव केवल आदत का नहीं, बल्कि सोच के पतन का संकेत है। सोशल मीडिया इस संकट को और तेज कर रहा है। दिखावटी सफलता, झूठी चमक और बिना मेहनत की कामयाबी के दृश्य युवाओं को भ्रमित कर रहे हैं। वास्तविक संघर्ष उन्हें नाकामी लगता है और उसी टकराव से उपजी हताशा नशे की ओर ले जाती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बेरोजगारी से उपजा तनाव लंबे समय तक दबा रहने पर नशे में बदल जाता है। जब युवा खुद को बेकार महसूस करने लगते हैं, तो वे मानसिक राहत के लिए गलत विकल्प चुनते हैं।
मोटिवेटर स्पीकर आलोक थानवी का कहना है कि पढ़ाई छोड़ने वाला किशोर सबसे अधिक जोखिम में होता है। यदि इसी चरण में मार्गदर्शन और कौशल प्रशिक्षण नहीं मिला, तो वापसी कठिन हो जाती है। इसी तरह खेल केवल शारीरिक गतिविधि नहीं, बल्कि युवाओं को लक्ष्य और अनुशासन देता है। इसी तरह सोशल मीडिया की बनावटी दुनिया युवाओं को वास्तविक क्षमता से काट रही है, जिससे असंतोष और नशे की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यदि रोजगार, शिक्षा, खेल और मानसिक स्वास्थ्य पर एक साथ गंभीर पहल नहीं हुई, तो युवाओं वर्ग में बढ़ रहा यह संकट आने वाले समय में और खतरनाक रूप ले सकता है।
Published on:
06 Jan 2026 11:41 pm
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