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सीमाओं से परे नाथ परंपरा का सेतु, ख्याला से रताकोट तक अनंत आस्था

भारत और पाकिस्तान के बीच चाहे सरहद खड़ी हों और संबंध बेहद खराब हो, इसके बावजूद नाथ परंपरा जैसे प्राचीन आध्यात्मिक स्रोत आज भी दोनों देशों के लोगों के हृदयों को जोड़ते हैं।

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जब देशों का विभाजन होता है तो सीमाएं खिंचती हैं, नक्शे बदलते हैं, लेकिन आस्था का प्रवाह नहीं रुकता। भारत और पाकिस्तान के बीच चाहे सरहद खड़ी हों और संबंध बेहद खराब हो, इसके बावजूद नाथ परंपरा जैसे प्राचीन आध्यात्मिक स्रोत आज भी दोनों देशों के लोगों के हृदयों को जोड़ते हैं। इसी परंपरा के प्रमुख ख्याला मठ (जैसलमेर) के मठाधीश गोरखनाथ इन दिनों पाकिस्तान प्रवास पर हैं। वे दुबई होते हुए कराची पहुंचे, जहां से उनकी यात्रा मीरपुर खास होते हुए सांगड जिले के खिंपरो तहसील स्थित रताकोट मठ पहुंचे है।पाकिस्तान के कई गांवों में उनका स्वागत हो रहा है।

दो देशों को जोडऩे वाली प्राचीन साधना-धारा

नाथ परंपरा के इतिहास में रताकोट मठ (पाकिस्तान) और ख्याला मठ (भारत) का विशिष्ट योगदान है। रताकोट मठ की स्थापना 1604 में महंत वीरनाथ ने की। इसकी शाखा ख्याला मठ की स्थापना 1829 में महंत सहजननाथ ने की। स्वतंत्रता के बाद सीमाएं बदल गईं, पर दोनों मठों की परंपरा, साधना और श्रद्धा का सूत्र कभी नहीं टूटा। नाथ परंपरा योग, ध्यान और मानवता के सिद्धांतों पर आधारित रही है। इसका सार यही रहा है कि धर्म जोडऩे का माध्यम है, विभाजन का नहीं। गोरखनाथ का यह प्रवास उसी विचार को पुन: पुष्ट करता है।

आस्था की ताकत सरहदों से परे

जानकारों के अनुसार सीमाएं मिट सकती हैं, पर आस्था नहीं—क्योंकि यह किसी नक्शे में नहीं, दिलों में जन्म लेती है और वहीं फलती-फूलती है। राजनीतिक सीमाएं चाहे स्थायी प्रतीत हों, पर अध्यात्म की धारा हर दीवार को पार कर जाती है। गुरु गोरखनाथ का आध्यात्मिक प्रवास धर्म का सच्चा स्वरूप कर्मकांड की सीमा से आगे बढकऱ प्रेम, समरसता और कल्याण में निहित है। संत जब सीमाओं के पार संवाद करते हैं, तो वे दो देशों को नहीं, बल्कि दो संस्कृतियों और करोड़ों श्रद्धालुओं के हृदयों को जोड़ते हैं। उनके अनुसार नाथ परंपरा की यह अनंत मशाल पीढिय़ों से मानवता का मार्ग आलोकित करती रही है।