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दुश्मन पर तानी थी बंदूक, अब चला रहे कलम

-कारगिल युद्ध में पैर में लगे थे बम के छर्रे-सेवानिवृत्ति के बाद पटवारी बनकर निभा रहे सामाजिक दायित्व

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दुश्मन पर तानी थी बंदूक, अब चला रहे कलम

दुश्मन पर तानी थी बंदूक, अब चला रहे कलम

दीपक व्यास* जैसलमेर. मुश्किलों से सिर झुकाना है मना, हार कर आंसू बहाना है मना, कौनसी रात है जो कटती नहीं, कौनसी बात है जो बनती नहीं...। कारगिल युद्ध में भागीदारी करने वाले जैसलमेर निवासी मेघराजसिंह राठौड़ पैरों में बम के छर्रे खाए, लेकिन हौसला नहीं खोया। अपनी टीम के साथ ऊंचाई पर बैठे दुश्मनों को भी खदेड़ा। सेवानिवृत्ति के बाद राठौड़ अब पटवारी के तौर पर जिले में ही सेवाएं दे रहे हैं और अब बंदूक की जगह कलम हाथ में ले ली है। जिंदगी में दूसरी पारी में भी जब कारगिल युद्ध का जिक्र आता है तो उनकी भुजाएं फडकऩे रखती है और रुक्त संचार बढऩे के साथ ही आंखों में जीत की चमक छा जाती है।
राजस्थान पत्रिका से खास बातचीत में मेघराजसिंह राठौड़ ने बताया कि वे मूलत: नीम्बली गांव से तालुक्क रखते हैं। वर्ष 1996 में भारतीय सेना में सिपाही के तौर पर वे शामिल हुए और करीब 6 साल तक उनकी नियुक्ति जम्मू कश्मीर में रही। वे बताते हैं कि सेना में जाने का सपना उनका बचपन से ही था। कारगिल युद्ध के दौरान रजौरी पुंछ में सैन्य दल के साथ दुश्मन से लोहा लेने के दौरान उनके पैर में बम के छर्रे लग गए और वह घायल हो गए। इस घटना के बाद भी उनका सेना में जज्बा चरम पर रहा। उन्होंने बताया कि भीतरगली सेक्टर में सेना की टुकड़ी चढ़ाई पर चढऩे का प्रयास कर रही थी और ऊंचाई से दुश्मन की ओर से लगातार फायरिंग की जा रही थी, बम बरसाए जा रहे थे। ऊंचाई अधिक थी, लेकिन हौसला उससे भी अधिक था। यहां 11 राजपूताना राइफल्स ने आखिकर पहाड़ी से दुश्मन को खदेड़ दिया। उनकी नियुक्ति 5 राजपूताना राइफल्स में थी। उन्होंने कहा कि भीमरगली में 3 वर्ष में करीब 100 आतंकी मुठभेड़ में मारे गए थे। कारगिल में घायल होने के बाद जब वे स्वस्थ हुए तो वर्ष 2003 में उनकी ड्यूटी सेक्टर में थी। यहां लालूबवेली घाटी में उन्होंने सेना के लिए अपना कर्तव्य निर्माण किया। वे अरुणाचल प्रदेश से लेकर असम और उदयपुर में भी रहे और हवलदार पद से सेवानिवृत्त हुए। वर्ष 2013 में पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उन्होंने सेवानिवृत्ति ले ली और इसके बाद से वह राजस्व विभाग में पटवारी के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे है। अपने सेवाकाल में भी वे सेना में सीख गए अनुशासन का पूरा ध्यान रखते हैं और आम आदमी की तकलीफ को दूर करने के लिए प्रयासरत हैं। उनके परिवार में एक बेटा एक बेटी है, जो पढ़ रहे हैं। मेघराजसिंह के तीन भाई भी सेना में है और एक भाई राजस्थान पुलिस में है। उनके चाचा भी सेना से सेना में है।