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तीन गुणा पांच की चारपाई पर ही सिमटी 13 वर्षीय नवीन की जिंदगी

इतना रोऊं कि ईश्वर भी रो पड़े...-पिता ने छोड़ी दुनिया तो छिन गया रोटी का भी आसरा भी-भाई के इलाज के लिए भटक रहा चेतन
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तीन गुणा पांच की चारपाई पर ही सिमटी 13 वर्षीय नवीन की जिंदगी

तीन गुणा पांच की चारपाई पर ही सिमटी 13 वर्षीय नवीन की जिंदगी


जैसलमेर. कहा जाता है कि बच्चे ईश्वर के ही रूप है, लेकिन 13 वर्षीय नवीन की दशा ऐसी है कि ईश्वर भी रो पड़े। जब माता-पिता ने अपने लाडले बेटे का नाम नवीन रखा था तो उन्हें यह नहीं मालूम था कि नाम से किस्मत नहीं बदलती। नवीन जब पलंग से उठता है तो न तो उसकी आंखे खुलती है और न ही उसे कोई सुध रहती है। उसकी जिंदगी महज तीन गुणा पांच की चारपाई पर ही सिमट गई है। वह न तो चल सकता है, न खुद खा सकता है और न ही पी सकता है। वह शारीरिक व मानसिक दोनों तरह से नि:शक्त है। नवीन की शारीरिक हालत को देखकर मुंह से बरबस यही निकलता है कि क्या प्रकृति किसी के जीवन में इतनी कू्ररता कर सकती है? जैसलमेर शहर के छप्पर पाड़ा में एक कच्चे मकान में रहने वाले चेतन देवपाल के सिर से पिता का साया छिन चुका है। नवीन उसका छोटा भाई है। परिवार में मां व एक भाई और है। परिवार के भरण पोषण का जिम्मा उसी पर है। चंद वर्ष पहले ही अपने पति को खो चुकी माया को अपने छोटे बेटे नवीन के भविष्य को लेकर अज्ञात भय सताता है और उसके मन विचलित होने लगता है। जिस बेटे की मामूसी सी खांसी भी उसकी माता माया को विचलित कर देती थी, वह आज अपने बेटे की इस हालत को देखकर वह हर दिन अकेले में रोती है। जब उसे अपने दो अन्य बेटों का ख्याल आता है तो वह हिम्मत जुटाती है। बड़ा बेटा चेतन भी अपनी मां को धीरज बंधाता है। तीनों को यह विश्वास है कि उनका वर्तमान जैसा आज है, वैसा कल नहीं होगा। सुबह चेतन मजदूरी के लिए निकल जाता है और उसके लौटने से पहले उसकी माता अपने घर का कामकाज निपटा कर छोटे बेटे नवीन को नहला-धुलाकर व खाना खिलाती है। नवीन बंद आंखों से ही जीवन की हकीकत को देख भी रहा है महसूस भी कर रहा है। इसके बाद माया और उसका दूसरा बेटा तीरथ इंतजार करते हैं चेतन का। एकबारगी तीनों एक साथ भोजन कर जीवन के मधुरतम सपने देखते हुए भविष्य की योजना तैयार करते है। इस दौरान जब बिस्तर पर सो रहे नवीन की एक चीख निकलती है तो वे तीनों उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं। चेतन व तीरथ अपने छोटे भाई नवीन को संभालते हैं। थोड़ी देर में सब कुछ सामान्य हो जाता है और माया अकेले में शून्य को निहारती है।
कौन सुनेगा, किसको सुनाएं
नवीन का बड़ा भाई चेतन महज 26 वर्ष का है और पूरे परिवार को बोझ उठा रहा है। उसका कहना है कि घर में छह जने हैं। पिता कम उम्र में ही चल बसे। जीवन यापन के लिए एक टैक्सी थी, परिवार की गाड़ी जैसे-तैसे चलाने का आसरा थी, वह भी किश्तें नहीं भरने के कारण छिन चुकी है। जिस दिन चेतन को मजदूरी मिलती है, उस दिन घर में दीवावली सा माहौल होता है, लेकिन अधिकांश दिन गुजारा बुमुश्किल ही चल पाता है। चेतन को मलाल है कि उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर होने व पिता का साया छिन जाने के कारण वह अपने बीमार भाई का उपचार कहीं भी करवा नहीं सकता। पहले उसने जोधपुर में अपने भाई का उपचार करवाया, लेकिन आर्थिक कारण उसकी उम्मीदों पर भारी पड़ रहे हैं। उसकी नजरें केवल सरकारी नजरों के इनायत होने के इंतजार में हैं, जो उसकी सुध ले सकेे।