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सरहद पर बसने का दर्द, अपनों की चिंता बेहद

-आजादी की 75 वें वर्ष बाद भी जिम्मेदारों की नहीं टूटी तंद्रा-वायदों की अधूरी कहानी बयां कर रही विकास की 'राहÓ

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सरहद पर बसने का दर्द, अपनों की चिंता बेहद

सरहद पर बसने का दर्द, अपनों की चिंता बेहद

जैसलमेर. यह बात अचंभित करने वाली हो सकती है कि आजादी के 75 वर्ष होने के बाद भी किसी गांव के बाशिंदों के लिए सूचना भेजने का माध्यम केवल बस हो, लेकिन यह बात एकदम सही है। सरहद पर बसे कुछ गांव ऐसे भी हैं जहां से जब कोई बस गांव से गुजरती है तो मौसम से लेकर परिवार के कुशल क्षेम की जानकारी उसे गांव के जा हरे किसी व्यक्ति के माध्यम से या फिर चि_ी-संदेश से भेजी जाती है। इन सरहदी गांवों में देश भक्ति का ज्वार उफान पर रहता है। पाक से घुसपैठ के इरादों को इन गांवों के बाशिंदे जागरुकता के बूते कभी सफल नहीं होने देतें, लेकिन उन्हें इस बात की पीड़ा भी है कि न तो उनके पास बेहतर चिकित्सा और न ही शिक्षा की सुविधा उपलब्ध है। फाइव जी की ओर बढ़ते देश के सबसे बड़े जिले की फेहरिस्त की शामिल सरहदी जिले में एक गांव से दूसरे गांव में रहने वाले परिचित की कुशल क्षेम नहीं पूछ सकते।
दूर होने से 'दर्शन ' नहीं
ग्रामीण लालूसिंह व गंगासिंह बताते हैं कि म्याजलार, करड़ा, पोछीना, गुंजनगढ़, लूणार, बींजराज का तला, सत्तो, केरला, मिठड़ाऊ, केसरसिंह का तला, दव, हटार, दबड़ी, मसूरिया, फलेड़ी, बीदा, नीम्बा, बैरसियाला, धाणेली, छतांगढ़, विश्रोईयाला, रावतरी, फूलिया आदि सरहदी गांव की दूरी जिला मुख्यालय से 100 से अधिक किलोमीटर है और यहां पहुंचना भी मार्ग व यातायात के लिहाज से आसान नहीं है।
पशुपालन पर टिकी अर्थव्यवस्था
-सोढ़ाण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पशुपालन व्यवसाय पर टिकी है।
-यहां रहने वाले अधिकांश ग्र्रामीणों को कृषि भूमि का हक ही नहीं मिल पाया है।
-धाणेली और रावतरी गांव आजादी के 73 वर्षों बाद भी अब तक सड़क सुविधा से वंचित है।
-बाखासर से लेकर तनोट तक भारतमाला सड़क परियोजना का काम चल रहा है, लेकिन डीएनपी की आपत्ति सुंदरा से म्याजलार तक करीब 40 किलोमीटर सड़क का काम अटका हुआ है।
-सरहदी गांवों में रहने वाले लोगों को क्षतिग्रस्त व बदहाल मार्गों के कारण गंभीर बीमारी से ग्रसित मरीज को वाहन में ले जाना खतरे से खाली नहीं है।