script... then only the cry of shortage of doctors will end | ...तभी खत्म होगा डॉक्टर्स की कमी का रोना | Patrika News

...तभी खत्म होगा डॉक्टर्स की कमी का रोना

- जिले में टिकते नहीं हैं चिकित्सक
- आधे से ज्यादा पद रहते हैं रिक्त

जैसलमेर

Updated: April 17, 2022 08:06:34 pm

जैसलमेर। सीमांत जैसलमेर जिले की चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवाओं की राह का विकट रोड़ा यहां चिकित्सकों की कमी है। अव्वल तो चिकित्सकों की नियुक्ति ही कम होती है और पिछले कुछ वर्षों से राज्य सरकार ने जितनी भी बार यह कमी दूर करने की कोशिश की है, उसे कामयाबी नहीं मिली क्योंकि जितने चिकित्सक लगाए जाते हैं, उनमें से औसतन 20 से 30 प्रतिशत तो कार्य ग्रहण करने ही नहीं पहुंचते और कोई न कोई तिकड़म लगा कर मनचाही जगह पर रह जाते हैं। सरकार ज्यादा ही सख्ती दिखाए तब यहां आकर कार्यभार ग्रहण करने के बाद आगे पढ़ाई करने के बहाने या किसी और तरीके से स्थानांतरण करवाकर वांछित जगह चले जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण, लगभग सभी चिकित्सकों का मूलत: बाहरी जिलों से संबंधित होना होता है। वे अपने घर से कई सौ किलोमीटर दूर सरहद पर बसे मरुस्थलीय जिले में काम करने से कतराते हैं। चिकित्सकों और नर्सिंग स्टाफ की कमी के कारण जिला मुख्यालय स्थित जवाहिर चिकित्सालय का आइसीयू आज तक सुचारू रूप से संचालित नहीं किया जा सका है। जैसलमेर में प्रस्तावित मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस की प्रवेश परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले सौ जनों को डॉक्टरी की पढ़ाई करने का अवसर मिलेगा। इसका मतलब यही हुआ कि पहले पांच साल में सौ डॉक्टर यहीं पर तैयार हो जाएंगे। जिन्हें अगर बाद में जिले में नियुक्ति दी जाती है तो कई जने खुशी-खुशी काम करने को तैयार हो जाएंगे क्योंकि तब तक वे जैसलमेर में रहने के अभ्यस्त हो जाएंगे। इसी तरह से अस्पताल में काम करने के लिए मेडिकल कॉलेज के छात्र रेजिडेंट डॉक्टर्स के तौर पर सेवाएं देकर भी चिकित्सकों की कमी को दूर करेंगे।
घर के युवा आएंगे काम
जैसलमेर में मेडिकल कॉलेज की स्थापना से जिले के मूल निवासी युवा भी काफी संख्या में प्रवेश पा सकेंगे। निश्चित रूप से नए संस्थानों की शुरुआत से सरकारी कॉलेजों में सीटों की संख्या में इजाफा होगा। जिले में वर्तमान में और इससे पहले भी कई दशकों तक स्थानीय अथवा उन चिकित्सकों ने जमकर अपनी सेवाएं दी हैं, जिन्होंने जैसलमेर को अपना घर बना लिया और स्थायी रूप से बाहरी जिलों से आकर बस गए। वर्षों पहले जैसलमेर में अपने पहले कार्यकाल में मुख्यमंत्री के रूप में जब अशोक गहलोत आए थे, तब उन्होंने कहा था कि जैसलमेर के युवा पढकऱ डॉक्टरी की पढ़ाई करेंगे, वे ही जिले में बढ़-चढकऱ सेवाएं देने के काम आएंगे। उनकी बात काफी हद तक सच साबित हुई है। मौजूदा समय में जैसलमेर मुख्यालय सहित जिलेभर में सरकारी अस्पताल व चिकित्सा केंद्रों के अलावा निजी क्षेत्र के चिकित्सालयों में स्थानीय युवक-युवतियां चिकित्सक के तौर पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। उनके समर्पित भाव से सेवाएं देने से काफी हद तक डॉक्टर्स की कमी दूर भी हुई है। जिले में मेडिकल कॉलेज के प्रारंभ हो जाने से उनकी संख्या में और बढ़ोतरी होने की पूर्ण संभावना है।
स्तर में भी होगा सुधार
वर्तमान समय में जैसलमेर में कार्यरत चिकित्सक चाहकर भी जांच और उपचार के पूरे संसाधन उपलब्ध नहीं होने की वजह से मरीज का पूर्ण इलाज नहीं कर पाते और कई बार उनके सामने मरीज को बाहरी शहरों के लिए रेफर करना मजबूरी बन जाता है। मेडिकल कॉलेज की स्थापना के साथ प्रयोगशाला व ऑपरेशन थिएटर संबंधी संसाधनों का विकास होगा। इससे मरीजों को बाहर भेजने की बजाए यहीं पर उनका मुमकिन इलाज हो सकेगा। अभी ऐसे कितने ही मरीज हैं जिनकी आर्थिक दशा अथवा पारिवारिक कारण उन्हें बाहर जाकर इलाज करवाने की छूट नहीं देते। ऐसे मरीजों के लिए तो मेडिकल कॉलेज किसी वरदान से कम नहीं होगी। गौरतलब है कि जिला स्तर के एकमात्र सरकारी जवाहिर चिकित्सालय में ही थोड़े संसाधन बढऩे और चिकित्सकों की मौजूदगी से कई किस्म के ऑपरेशन होने लगे हैं। इनमें सबसे प्रमुख ऑर्थोपेडिक ऑपरेशन हैं। जिनके लिए पूर्व में चिकित्सक नहीं होने के चलते जोधपुर, डीसा, अहमदाबाद आदि जाने की मजबूरी रहती थी। पिछले अर्से के दौरान हड्डियों के कई बड़े और जटिल ऑपरेशन इस अस्पताल में डॉ. सुरेंद्रसिंह और डॉ. लोकपाल सिंह ने किए हैं।
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