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ब्रीडिंग सेंटर्स में प्राकृतिक रूप से गोडावण के तीन चूजों की गूंजी चहचहाट

लुप्तप्राय: माने जा रहे राज्य पक्षी गोडावण की तादाद में बढ़ोतरी की दिशा में आशा की नई किरण जागी है। जिले के गोडावण ब्रीडिंग सेंटरों में 3 नए चूजों का जन्म कृत्रिम गर्भाधान की बजाय प्राकृतिक ढंग से हुआ है।

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लुप्तप्राय: माने जा रहे राज्य पक्षी गोडावण की तादाद में बढ़ोतरी की दिशा में आशा की नई किरण जागी है। जिले के गोडावण ब्रीडिंग सेंटरों में 3 नए चूजों का जन्म कृत्रिम गर्भाधान की बजाय प्राकृतिक ढंग से हुआ है। इसे गोडावण संरक्षण के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा है। इन्हें मिलाकर जिले के सम और रामदेवरा स्थित ब्रीडिंग सेंटरों में गोडावण की कुल तादाद 79 हो गई है। सेंटरों में प्राकृतिक ढंग से गोडावण का अंडा दिया जाना और उसमें से चूजे का निकलना ज्यादा बड़ी बात इसलिए है क्योंकि अब तक यह कार्य कृत्रिम प्रजनन के जरिए हो रहा था और गोडावण की देखभाल वैज्ञानिक कर रहे थे। इन्हें मिला कर जिले के राष्ट्रीय मरु उद्यान (डीएनपी) में संचालित संरक्षण कार्यक्रम के तहत इस वर्ष अब तक 11 चूजों का जन्म हो चुका है।

पक्षियों ने खुद बनाए जोड़े

गोडावण संरक्षण के तहत अब तक जंगल से अंडे लाकर ब्रीडिंग सेंटरों में उनसे चूजे प्राप्त करने का कार्य मुख्य तौर पर किया जा रहा था। वहीं अब संरक्षण केंद्रों में रह रहे पक्षी खुद जोड़े बनाकर अंडे दे रहे हैं। आने वाले समय में वन विभाग 79 गोडावणों को खुले वातावरण में छोडऩे की तैयारी कर रहा है। जंगल में छोडऩे से पहले ग्रासलैंड में शिकारियों से सुरक्षित बाड़े बनाए गए हैं। इसके अलावा हाइटेंशन बिजली लाइनों पर बर्ड डाइवर्टर लगाए गए हैं ताकि गोडावण सुरक्षित रह सकें। विशेषज्ञों के अनुसार गोडावण के प्राकृतिक प्रजनन की यह गति जारी रही तो आने वाले 5 वर्षों में गोडावण की आबादी सुरक्षित स्तर पर पहुंच जाएगी।

33 संस्थापक, 46 नए सदस्य

जिले के सम और रामदेवरा में स्थित दो गोडावण संरक्षण केंद्रों में 33 संस्थापक पक्षियों के अलावा अब नए सदस्यों की संख्या बढकऱ 46 हो गई है। इस तरह से केंद्रों में 79 गोडावण आवासित हैं। इनमें रामदेवरा में 54 और सम में 25 गोडावण हैं। गोडावण संरक्षण कार्यक्रम वर्ष 2019 में शुरू किया गया था। प्राकृतिक रूप से अंडों से चूजे निकलने से यह निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि केंद्रों में पक्षी तनावमुक्त हैं। जैसलमेर में वन विभाग के साथ वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की ओर से वैज्ञानिक तौर-तरीकों से गोडावण संरक्षण के निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। डीएनपी के डीएफओ बृजमोहन गुप्ता ने बताया कि संरक्षण केंद्रों में रह रहे गोडावणों को आगामी तीन-चार महीनों के बाद पूरी तैयारी के साथ मुक्त वातावरण में छोड़ा जाएगा। जिससे वे प्राकृतिक ढंग से जीवन जी सकें।

मरुस्थल का गौरव है गोडावण

गोडावण, जिसे अंग्रेजी में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड कहा जाता है, भारत का अत्यंत दुर्लभ और विलुप्ति के कगार पर खड़ा पक्षी है। यह राजस्थान का राज्य पक्षी भी घोषित किया जा चुका है। यह मुख्य रूप से थार मरुस्थल में स्थित जैसलमेर जिले में मिलता है। इसके अलावा उनकी कुछ संख्या मध्यप्रदेश व गुजरात में भी हैं। गोडावण का आकार बड़ा होता है, लंबी टांगें और गर्दन इसकी पहचान है। यह खुले घास के मैदानों और रेगिस्तानी इलाकों में रहना पसंद करता है लेकिन बीते अर्से के दौरान बदलते पर्यावरण, अवैध शिकार, बिजली लाइनों से टकराव और आवास नष्ट होने के कारण इनकी संख्या तेजी से घट गई है। इसके संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें कृत्रिम प्रजनन और संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम शामिल हैं।