
2 युवतियों ने ठुकराया सांसारिक सुख (फोटो- पत्रिका)
जैसलमेर: राजस्थान की स्वर्णनगरी जैसलमेर ने गुरुवार को एक ऐसी आध्यात्मिक क्रांति देखी, जिसने आधुनिक चकाचौंध के बीच त्याग और तपस्या की शक्ति को पुनः स्थापित कर दिया।
जैन धर्म की पावन परंपरा के अनुसार, दो मुमुक्षु युवतियों संतोष मालू और मैना लूणिया ने अपनी भरी-पूरी गृहस्थ दुनिया और सुनहरे भविष्य के सपनों को पीछे छोड़ते हुए संयम मार्ग (दीक्षा) को अंगीकार कर लिया। गच्छाधिपति आचार्य जिन मणिप्रभ सूरीश्वर महाराज के पावन सान्निध्य में आयोजित इस महोत्सव ने न केवल जैसलमेर, बल्कि पूरे देश के जैन समाज को भक्ति के रस में सराबोर कर दिया।
दीक्षा ग्रहण करने से पूर्व शहर की सड़कों पर जब भव्य शोभायात्रा निकली, तो दृश्य देखने लायक था। हजारों की संख्या में उमड़े जनसैलाब ने पुष्पवर्षा कर मुमुक्षुओं का अभिनंदन किया।
बैंड-बाजों और मंगलगान के बीच एक ओर जहां परिवारजनों की आंखें अपनी लाड़लियों को विदा करते हुए नम थीं, वहीं दूसरी ओर धर्म के प्रति अगाध गौरव का भाव चेहरे पर झलक रहा था। केसरिया वस्त्रों में सजी दोनों मुमुक्षु युवतियों ने नाचते-गाते हुए संसार को अंतिम विदाई दी।
दीक्षा लेने वाली 28 वर्षीय संतोष मालू की कहानी आज की युवा पीढ़ी के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है। कॉमर्स (वाणिज्य) में स्नातक संतोष का बचपन से ही झुकाव अध्यात्म की ओर था, लेकिन कोरोना काल की अनिश्चितताओं ने उनके भीतर वैराग्य की लौ को और तेज कर दिया।
दीक्षा ग्रहण करने से ठीक पहले उनके एक बयान ने सबका दिल जीत लिया। उन्होंने कहा, लोग सोचते हैं कि मैं संसार छोड़कर दासी बनने जा रही हूं, लेकिन सच यह है कि मैं अब तक संसार की दासी थी, अब मैं परमात्मा की राह पर चलकर आत्मिक सुख की 'रानी' बनने जा रही हूं।
दीक्षा के बाद उन्हें 'संकल्पप्रज्ञा' नाम प्रदान किया गया। उन्होंने पंच महाव्रत सत्य, अहिंसा, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का संकल्प लेकर साधना की दुनिया में कदम रखा।
वहीं, दूसरी मुमुक्षु मेना लूणिया ने भी आत्म-कल्याण के उद्देश्य से अपनी सुख-सुविधाओं का त्याग किया। आगमों के अध्ययन और सत्संग के प्रति उनकी अटूट श्रद्धा ने उन्हें सांसारिक बंधनों से मुक्त होने के लिए प्रेरित किया।
दीक्षा समारोह के दौरान जब 'केशलोचन' (हाथों से बाल उखाड़ना) और वेश परिवर्तन की विधि हुई, तो उनकी दृढ़ता ने उपस्थित जनसमूह को स्तब्ध कर दिया। उन्हें अब 'समर्पणप्रज्ञा म.सा.' के नाम से जाना जाएगा।
आयोजन समिति के सचिव पदम टाटिया ने बताया कि जैसलमेर में यह महोत्सव अभी थमा नहीं है। 6 से 8 मार्च तक शहर में भव्य 'चादर महोत्सव' और 'दादागुरु इकतीसा पाठ' का आयोजन किया जाएगा।
7 मार्च: दुनिया भर के करीब एक करोड़ आठ लाख श्रद्धालु एक साथ 'दादागुरु इकतीसा' का सामूहिक पाठ करेंगे।
विदेशी मेहमान: इस भव्य आयोजन के साक्षी बनने के लिए देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु जैसलमेर पहुंच चुके हैं।
जैसलमेर की इस पावन धरा पर संपन्न हुई यह दीक्षा केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के लिए एक संदेश है कि सुख सुविधाओं में नहीं, बल्कि आत्मानुशासन और त्याग में मिलता है। मुमुक्षु युवतियों का यह कदम राजस्थान के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है।
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Updated on:
6 Mar 2026, 9:39 AM IST
Published on:
6 Mar 2026, 9:38 AM IST
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