23 जून 2026,

मंगलवार

Patrika Logo
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Jaisalmer: मोबाइल स्क्रीन में सिमट रहा गांव, खो रही पहचान और परंपराएं

रेगिस्तान के गांवों में कभी लोकगीतों, चौपालों और सामूहिक जीवन की जो संस्कृति जीवंत थी, वह अब धीरे-धीरे फीकी पड़ती नजर आ रही है। मोबाइल फोन और डिजिटल मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव ने ग्रामीण सामाजिक गतिविधियों और पारंपरिक मेल-मिलाप की जगह ले ली है। बदलती जीवनशैली के बीच लोक परंपराएं और सांस्कृतिक विरासत बुजुर्गों की स्मृतियों तक सिमटने लगी हैं।
2 min read
Google source verification
jaisalmer village news photo

रेगिस्तान के गांवों में घटती चौपाल संस्कृति, बढ़ता डिजिटल प्रभाव।

जैसलमेर. रेगिस्तान के गांवों की पहचान कभी लोकगीतों, चौपालों, चरखों की घरघराहट और सामूहिक जीवन से होती थी। शाम ढलते ही चौक-चौराहों पर लोग जुटते, महिलाएं लोकगीत गातीं और बुजुर्ग किस्सों के जरिए नई पीढ़ी को संस्कारों से जोड़ते थे। अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है। गांवों का सामाजिक जीवन मोबाइल स्क्रीन और डिजिटल मनोरंजन तक सिमटता जा रहा है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि तकनीक ने सुविधाएं बढ़ाई हैं, लेकिन इसके साथ सामुदायिक जीवन कमजोर हुआ है। गांवों में आपसी संवाद घटा है और परंपरागत सांस्कृतिक गतिविधियां सीमित होती जा रही हैं। गांवों के बुजुर्ग बताते हैं कि दो दशक पहले तक अधिकांश सामाजिक गतिविधियां सामूहिक होती थीं, जबकि अब परिवारों के भीतर भी संवाद कम हुआ है।

बदलते गांव की नई तस्वीर

-हाथ चक्कियों का स्थान आटा चक्की ने ले लिया।

-चरखे और पारंपरिक हस्तशिल्प घरों से लगभग गायब

-चौपालों पर बैठकों की संख्या लगातार घटी

-लोकगीत और लोकनृत्य केवल आयोजनों तक सीमित

-बच्चों का खेल मैदानों से अधिक समय मोबाइल पर बीत रहा

बदलाव की कहानी

सरहदी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्मार्टफोन तेजी से बढ़े हैं। विभिन्न सर्वेक्षणों के अनुसार ग्रामीण युवाओं का औसत स्क्रीन टाइम प्रतिदिन 4 से 6 घंटे तक पहुंच रहा है।

दूसरी ओर कृषि और घरेलू कार्यों में मशीनों के बढ़ते उपयोग ने पारंपरिक श्रम आधारित गतिविधियों को कम किया है। इससे कई लोककौशल और पारंपरिक ज्ञान नई पीढ़ी तक नहीं पहुंच पा रहे।

छांव भी हुई कम, बदल रहा पर्यावरणीय संतुलन

रेगिस्तानी गांवों में कभी खेजड़ी, रोहिड़ा और नीम के पेड़ सामाजिक जीवन का केंद्र होते थे। ग्रामीण इनकी छांव में बैठकर निर्णय लेते और मेलजोल बढ़ाते थे। अब कई गांवों में पेड़ों की संख्या घटी है जबकि पक्के निर्माण बढ़े हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में हरित आवरण घटने से स्थानीय तापमान और गर्मी के प्रभाव में वृद्धि महसूस की जा रही है। इससे पारंपरिक जीवनशैली पर भी असर पड़ा है।

सामाजिक बदलाव या सांस्कृतिक संकट

समाजशास्त्रियों के अनुसार गांव आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं, जो स्वाभाविक प्रक्रिया है। चुनौती यह नहीं कि बदलाव हो रहा है, बल्कि यह है कि विकास और सांस्कृतिक विरासत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

यदि लोककला, लोकसंगीत, पारंपरिक खेल, हस्तशिल्प और सामुदायिक आयोजनों को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में ग्रामीण पहचान केवल पुस्तकों और बुजुर्गों की स्मृतियों तक सीमित रह सकती है।

एक्सपर्ट व्यू: सांस्कृतिक पूंजी को बचाना जरूरी

तकनीक को रोकना संभव नहीं है, लेकिन गांवों की सांस्कृतिक पूंजी को बचाना जरूरी है। यदि स्कूलों, पंचायतों और सामाजिक संस्थाओं के स्तर पर लोकसंस्कृति आधारित गतिविधियां बढ़ाई जाएं तो नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रह सकती है।

-डॉ. महेन्द्रसिंह, समाजशास्त्री