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न बुझ रही धोरों की प्यास और न रातें हो रही रोशन

-विख्यात पर्यटन स्थल के साथ सरकारी महकमों का बद्तर सुलूक- पानी पिलाने के आड़े ला रहे नियम-धोरों पर बिजली भी मार रही डंक

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न बुझ रही धोरों की प्यास और न रातें हो रही रोशन

न बुझ रही धोरों की प्यास और न रातें हो रही रोशन


जैसलमेर. जैसलमेर को ख्याति दिलाने और यहां पर्यटन को परवान चढ़ाने में सम के जिन बल खाते धोरों की अहम भूमिका है और जिस जगह के आकर्षण में बंधकर हर साल लाखों की संख्या में देशी-विदेशी सैलानी पहुंचते हैं, उस सम सेंड ड्यून्स पर हजारों स्थानीय बाशिंदों और सैलानियों को सरकारी महकमे पीने का मीठा पानी तक मुहैया नहीं करवा रहे हैं। नियमों की ओट में दुबके अधिकारी न लोगों की पुकार सुन पा रहे हैं और न ही राज्य पशु ऊंट की। ऐसे ही यहां बिजली की लाइन खींचकर कहने को विद्युत आपूर्ति शुरू कर दी गई है लेकिन उसमें इतने व्यवधान आते हैं कि रिसोर्ट वालों को हमेशा जनरेटर चलाए रखने पड़ते हैं। मौजूदा समय में स्थानीय लोगों तथा राज्य पशु ऊंटों को फ्लोराइड युक्त खारा पानी पीने की विवशता है। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिक विभाग द्वारा सेंड ड्यून्स से आगे सम, कनोई व सलखा तक नहर का मीठा पानी पहुंचाया जा चुका है।
बदल नहीं रहा नियम
सम सेंड ड्यून्स पर पीने का शुद्ध और मीठा पानी मुहैया करवाने के बीच एक सरकारी नियम आड़े आ रहा है। जानकारी के अनुसार जन स्वास्थ्य अभियांत्रिक विभाग घर-घर नल कनेक्शन उन्हीं गांवों में जारी कर सकता है, जहां कम से कम चार हजार की आबादी निवास करती हो। यह सरकारी नियम राजस्थान के अन्य सघन आबादी वाले जिलों के लिए भले ही मुफीद हो, लेकिन जैसलमेर जैसे विरल आबादी वाले जिले में यह नियम बड़ी आबादी को पीने के शुद्ध पानी से वंचित किए हुए है। इसके अलावा सम सेंड ड्यून्स पर सीजन के दिनों में ऊंट चालकों, लोक कलाकारों, रिसोट्र्स में काम करने वालों को मिला कर गिना जाए तो उनकी संख्या तीन-चार हजार तक पहुंच ही जाती है। फिर यहां करीब सौ रिसोट्र्स कायम हैं जहां सीजन में पांच से दस हजार सैलानी ठहरते हैं। व्यावहारिक तौर पर सोचा जाए तो आबादी संबंधी विभागीय नियम की पूर्ति हो रही है। वर्तमान में रिसोट्र्स संचालकों की तरफ से मेहमानों के लिए पीने के पानी के रूप में बोतलबंद पानी या सम गांव से आरओ का पानी मंगवाने की मजबूरी है। अन्य कार्यों के लिए वे टैंकर मंगवाते हैं। औसतन एक रिसोर्ट संचालन को साल में करीब चार लाख रुपए तो पानी पर ही खर्च करने पड़ रहे हैं। जो सैलानी ड्यून्स पर केवल घूमने आते हैं, उन्हें बोतलबंद पानी खरीदने की मजबूरी है।
बिजली व्यवस्था नाम की
सम सेंड ड्यून्स पर करीब सौ रिसोट्र्स व कैम्प्स में बिजली पहुंची हुई है, लेकिन उचित देखभाल और संबंधित कार्मिकों की अनदेखी की वजह से दिन व रात के समय कई-कई बार बिजली गुल हो जाती है। जिसे सुधरने में लम्बा वक्त लगता है। अलग से फीडर बनाकर बिजली का पक्का इंतजाम करने में डिस्कॉम विफल साबित हो रहा है। व्यवसायियों से कॉमर्शियल दर से बिजली शुल्क वसूलने वाला डिस्कॉम उन्हें नि:शुल्क ग्रामीण कनेक्शनों वाली आपूर्ति करता है। लखमणा के धोरों पर तो कृषि कनेक्शन की तर्ज पर सप्लाई की जा रही है। पानी व बिजली की समस्याओं के समाधान के लिए जिला प्रशासन व निर्वाचित जनप्रतिनिधियों तक पीड़ा जाहिर करने के बावजूद हालात में बदलाव नहीं आ पाया है।

फैक्ट फाइल -
- 06 लाख से अधिक सैलानी प्रतिवर्ष पहुंचते हैं सम
- 100 के करीब रिसोट्र्स सेंड ड्यून्स पर
- 01 हजार से ज्यादा ऊंट हैं सम क्षेत्र में

अहम समस्याओं का समाधान हो
सम सेंड ड्यून्स पर पीने के लिए शुद्ध व मीठा पानी तथा निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए। हम कॉमर्शियल दर पर जल कनेक्शन लेने के लिए तैयार हैं। यहां से आगे पाइप लाइन जा रही है, इसमें विभाग को अलग से ज्यादा कुछ खर्च करने की जरूरत भी नहीं है।
- कैलाश व्यास, अध्यक्ष, सम रिसोट्र्स सोसायटी