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मीठे पानी से हलक हो रहे तर तो पुराजल की कल्पना ले रही साकार रूप

सरस्वती नदी के अनुसंधान के लिए चुने गए थे क्षेत्र

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मीठे पानी से हलक हो रहे तर तो पुराजल की कल्पना ले रही साकार रूप

मीठे पानी से हलक हो रहे तर तो पुराजल की कल्पना ले रही साकार रूप

जैसलमेर. वाहनों के शोर-गुल और शोर-शराबे व चमक-दमक की संस्कृति की चकाचौंध से दूर यहां सरहदी गांवों का नजारा शांत व सुकून का अनुभव कराता है। जल ही जीवन... की कहावत भी यहां साकार रूप ले रही है। सरहद से २० और जिला मुख्यालय से १०० किलोमीटर की दूरी पर बसे करीब आधा दर्जन गांवों में एक सुखद बात समान है और वह है पानी के कुओं की। मीठे पानी के ये जल स्रोत यहां जन-जीवन के वास्तविक पोषक है। दूर-दूर तक खुला क्षेत्र, जहां एक ओर पशुओं के लिए चारागाह बन रहा है, वही दूसरी तरफ यहां प्रचुर मात्रा में मौजूद पानी यहां के बाश्ंिादों व पशुधन दोनों की प्यास बुझा रहा है। कुओ से जल सींच कर पानी निकालने की समस्या का भी अब सरकार ने समाधान कर दिया है। हर गांव में खुदे नलकूपों से पानी की निर्बाध रूप से आपूर्ति की जा रही है। सुनहरी रेत पर छितरे बसे घर, खेजड़ी की घनी छांव और उसके नीचे आराम से बैठा पशुधन, अधिकांशत: सन्नाटे के बीच कहीं-कहीं बतियाते ग्रामीण और पानी भरती कुछ गृहणियां...! शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ रही भौतिकतापूर्ण जीवन शैली से यहां का वातावरण जुदा है। सरहद के समीप बसे रणाऊ, घंटियाली, कुरिया और किशनगढ़ गांवों में कुछ ऐसा ही नजारा दिखाई दे रहा है।
पुरखों की दूरदर्शिता या कुदरत की देन
पुराजल प्रवाह की कल्पना भी यहां साकार नजर आती है। इसको पुरखों की दूरदर्शिता कहे या कुदरत की देन। धर्मी खुर्द से खारिया कुआ तक एक ही पंक्ति में करीब 40 किलोमीटर तक फैले इस क्षेत्र में कुओं की भी पंक्ति है। इन कुओं का जल स्तर 35 मीटर भू सतह से नीचे है। पानी की गुणवत्ता पीने योग्य है। गौरतलब है कि सरस्वती नदी के अनुसंधान के लिए भी इस क्षेत्र को चुना गया था। रेत के ऊंचे और लंबे टीलों के बीच बनी घाटियों में ये जल स्रोत मौजूद है। लहराती रेतीली घाटियां और वहां मौजूद खेजड़ी के पेड़ किसी जादुई दुनिया का अहसास कराते हैं।

फैक्ट फाइल
- 35 मीटर भू-सतह से नीचे कुओं का स्तर मौजूद
- ०6 से अध्कि सरहदी गांवों में मौजूद जल के भंडार
- 40 किलोमीटर तक एक ही पंक्ति में मौजूद है कुए

25 वर्ष पहले हुआ था सरस्वती पर काम
जिले में सरस्वती नदी के बहाव क्षेत्र को लेकर करीब 25 साल पहले काम किया जा चुका है। वर्ष 1994 और 1995 में केन्द्रीय भूजल बोर्ड, राजस्थान सरकार के भूजल विभाग व अन्य एजेन्सियों ने समन्वित तौर पर जिले के सीमावर्ती तनोट तथा घोटारु क्षेत्र में व्यापक स्तर पर कार्य किया था। अनुसंधान के तहत इस क्षेत्र में जल नमूने के रासायनिक विश्लेषण के अलावा कार्बन डेटिंग तकनीकी से भूजल की आयु भी ज्ञात की गई थी। इस क्षेत्र में नलकूप खोद कर भूमिगत जल तथा मिट्टी के नमूनों पर अनुसंधान किया गया था। वर्ष 2000 में भी मुम्बई से आई टीम ने भी इस क्षेत्र में अनुसंधान किया था।

सड़क तो पहुंची, रोजगार से दूरी
प्रकृति ने सरहदी गांवों को जहां एक ओर पानी का सुख दिया तो सीमा क्षेत्र विकास कार्यक्रम के तहत सरकार ने भी यहां विकास कार्य करवाए हैं। लाइट, और सड़क जैसी सुविधाएं घर-घर पहुंच गई है। कमी है तो रोजगार और बसावट की। हजारों हेक्टेयर खाली पड़ी जमीन पर कुछ बड़ी योजनाएं बने तो यहां का कायाकल्प हो सकता है। इंडो पाक सीमा का यह विशाल एरिया सरस्वती नदी के प्रवाह का भी गवाह बन सकता है।

एक्सपर्ट व्यू: जैसलमेर के प्रभारी भू-जल वैज्ञानिक डॉ. एनडी इणखिया से खास बातचीत -

पत्रिका- सरहदी क्षेत्र में कुओं से पानी पर्याप्त मिल रहा है। इस क्षेत्र की क्या विशेषता है ?
डॉ. इणखिया- सरस्वती नदी अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण इस क्षेत्र में 50 किलोमीटर के क्षेत्र में 12 कुए खुदे हुए हैं, जिनका पानी पीने योग्य है।
पत्रिका- इन कुओं की रासायनिक गुणवत्ता कैसी है?
डॉ. इणखिया- जल की रासायनिक गुणवत्ता 100 से 2000 टीडीएस के करीब है। भू-जल का स्तर 10 से 40 मीटर के बीच है।
पत्रिका- यहां की मिट्टी का अध्ययन किया गया है, क्या परिणाम निकला?
डॉ. इणखिया- सरहदी क्षेत्र में खुदे नलकूप की मिट्टी का अध्ययन करने पर यहां ग्रेवल पेच मिलना भी जल प्रवाह की संभावनाओं को बल देता है।
पत्रिका -जल नमूनों के विश्लेषण का क्या कोई नतीजा सामने आया?
डॉ. इणखिया- बार्क की ओर से इन कुओं के जल नमूनों की रेडियो एक्टिव एनेलेसिस करवाई गई थी। अध्ययन से जल की आयु वैदिक काल के आसपास आई थी।