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‘सावन मास बहे पुरवइया, बछवा बेच लेहु धेनु गइया…’

सावन मास में पुरवइया चलने का मतलब अकाल का संकेत माना जा रहा है। कवि घाघ ने इन पंक्तियों के जरिए बताया था कि सावन मास में पुरवइया बहने लगे तो समझो अकाल की स्थिति है।

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jalorenews

'सावन मास बहे पुरवइया, बछवा बेच लेहु धेनु गइया...'

जालोर. कवि घाघ की पंक्तियां 'सावन मास बहे पुरवइया, बछवा बेच लेहु धेनु गइया...', इन दिनों जिले पर सटीक बैठ रही है। सावन मास में पुरवइया चलने का मतलब अकाल का संकेत माना जा रहा है। कवि घाघ की ने इन पंक्तियों के जरिए बताया था कि सावन मास में पुरवइया बहने लगे तो समझो अकाल की स्थिति है। इसलिए बछवा यानि बैल बेचकर गइया ले लेनी चाहिए, ताकि घर का गुजारा चल सके।
सावन मास में बह रही पुरवइया ने जिले के किसानों व पशुपालकों की चिंता बढ़ा दी है। क्षेत्र में अभी तक औसत से कम बारिश हुई है। ऐसे में किसानों को अकाल की आशंका सता रही है। सावन मास आधा निकलने के बाद फसलों की बुवाई का समय भी निकलता जा रहा है। लेकिन इंद्रदेव बरसने का नाम नहीं ले रहे। अकाल की आहट को लेकर किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें दिख रही है तो पशुपालकों को चारे का संकट दिख रहा है। किसानों ने बताया कि हर बार सावन में बारिश होने से चारों ओर हरियाली छा जाती है, लेकिन इस बार अपेक्षाकृत बारिश नहीं हुई। हवा चलने से भी अकाल की आशंका भी बन रही है।
खाए जा रही भविष्य की चिंता
मानसून की अच्छी बारिश का लोगों को अब भी इंतजार ही है। बारिश नहीं होने से किसान चिंता में हैं। खेतों में बुवाई के बाद कई जगह तो एक बार भी सिंचाई नहीं हुई। ऐसे में फसल बर्बादी की कगार पर है। उम्मीदों पर तुषारापात होने से लोगों को भविष्य की चिंता खाए जा रही है।
सावन में भी सूखे ही गुजर रहे दिन
किसान बताते हैं कि फसल से अच्छी उत्पादकता लेने की उम्मीद थी, लेकिन सब कुछ बर्बाद हो गया। बुवाई के लिए इधर-उधर से जुगाड़ कर पैसे जोड़े थे, लेकिन फसल बर्बाद हो जाने से कर्जा चुकाना भारी हो जाएगा। सावन पर आस थी, लेकिन दिन सूखे ही गुजर रहे हैं।
दोहरी मार झेल रहे किसान
बोई गई फसलों में लट का प्रकोप भी होने लगा है। ऐसे में किसान दोहरी मार झेल रहे हैं। लट से बचाव के लिए दवाइयां खरीदने के लिए भी कर्जा लेना पड़ रहा है। बारिश के बगैर सूख रही फसलों में दवा का छिड़काव भी कर रहे हैं। जल्द ही बारिश नहीं हुई तो दवा में किया गया खर्च भारी पडऩे की आशंका है।