
Granite Industries Workers working in the shadow of death
जालोर. ग्रेनाइट नगरी के नाम से विख्यात जालोर में राजस्थान ही नहीं राज्य के बाहर के मजदूर भी काम कर रहे हैं। लेकिन ग्रेनाइट इकाइयों में लगातार हो रहे हादसे के बाद भी उद्यमी सबक नहीं ले रहे हैं और मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है। रविवार को ब्लॉक के नीचे दबने से हुई मौत का मामला हो या उससे पूर्व का कोई मामला, अधिकतर मामलों में ब्लॉक के नीचे दबने से ही श्रमिकों की मौत हुई हैं।यही नहीं अधिकतर मामलों में तो के्रन से ब्लॉक को उठाते समय ये हादसे हुए। बावजूद इसके अब तक इन हादसों को रोकने के लिए न तो उद्यमियों न ही ग्रेनाइट एसोसिएशन या प्रशासन की ओर से सुरक्षा के लिए एहतियाती कदम उठाए गए।
50 हजार से अधिक श्रमिक जुड़े, लेकिन लापरवाह प्रशासन
जालोर में ग्रेनाइट, माइनिंग और इससे जुड़े अन्य व्यापार में 50 हजार से अधिक श्रमिक जुड़े हैं। फैक्ट्री एक्ट के तहत इन पर निगरानी और कार्रवाई के लिए फैक्ट्री एंड बॉयलर इंस्पेक्टर होता है, लेकिन जालोर में 1 हजार से अधिक श्रमिकों का भविष्य और इन की सुरक्षा के लिए कोई जिम्मेदार अधिकारी जालोर में तैनात तक नहीं है।
सुरक्षा के इंतजाम नहीं, विभाग भी मौन
ग्रेनाइट, मार्बल माइंस, कटर, गैंगसो व गोदाम में काम करने वाले श्रमिकों के पास सुरक्षा के पूरे इंतजाम होने चाहिए। माइनिंग में काम करने वाले श्रमिकों के लिए बूट, रेडियम जैकेट, हेलमेट, हाथों के प्लास्टिक मौजे, सभी प्रकार की सुरक्षा की सुविधाएं होनी चाहिए। कटर, गैंगसा पर काम करने वाले श्रमिकों के पास नियमानुसार सुरक्षा के उपकरण होने चाहिए। ग्रेनाइट मार्बल क्षेत्र में हादसे होने के बाद पीडि़त परिवार एसोसिएशन के बीच समझौता ही एक मात्र रास्ता दिखाई देता है। जहां मृतक के परिवार को तुरंत ही सहायता मिल सकती है। जबकि नियमानुसार पुलिस कार्रवाई के बाद लेबर कोर्ट में मामला चलता है। कानूनी प्रक्रिया के बाद पीडि़त का वास्तविक उम्र के आधार पर मुआवजा तय होता है।
कंपीटिशन के चलते सुरक्षा दांव
जालोर का ग्रेनाइट विश्व विख्यात है और यहां से फिनिश गुड्स देशभर की बड़ी मंडियों तक पहुंचता है। जालोर बड़ा बाजार होने के चलते ग्रेनाइट का हब भी है। यहां बड़ी तादाद में ग्रेनाइट इकाइयां है और कंपीटिशन के चलते उद्यमी सुरक्षा ताक पर रखकर ग्रेनाइट का रफ माल का भारी मात्रा में स्टॉक करते हंै। चूंकि उद्यमियों के पास स्थान की कमी रहती है। ऐसे में ग्रेनाइट इकाई के परिसर में ही ब्लॉकों को एक के ऊपर एक जमाया जाता है। जैसे जैस रो मेटेरियल की जरुरत पड़ती है। इस स्टॉक से क्रेन से एक एक कर ब्लॉक को कटिंग के लिए उठाया जाता है और फिशिन गुड्स को मंडियों तक भेजा जाता है।
इसलिए खतरे का संकेत
रविवार को जिस ग्रेनाइट इकाई में यह हादसा हुआ वहां ग्रेनाइट का भारी ब्लॉक खिसक कर कमरे पर गिर गया था।यह ब्लॉक एक ब्लॉक के ऊपर ही रखा गया था। खास बात यह है कि पूरे इंडस्ट्रीज एरिया में इसी तरह से एक के ऊपर एक ब्लॉक को जमा कर रखा गया है। यही नहीं कई स्थानों पर तो चार स्तर तक भारी पत्थरों को इस तरह से रखा गया है। इन ब्लॉकों के नीचे ही अक्सर श्रमिक काम करते हैं। अभी बारिश का समय है और पानी के भराव या अधिक बारिश के दौरान ब्लॉक के धंसने की आशंका भी बनती है। यदि ऐसा होता है तो यह ब्लॉकों का पहाड़ ढह कर बड़े हादसे का कारण बन सकता है।
बरती जाती है सुरक्षा
ग्रेनाइट इकाइयों में श्रमिकों की सुरक्षा के प्रति पूरा ध्यान दिया जाता है। ग्रेनाइट ब्लॉक को मूव करने के लिए अब नए तरीके की के्रन लग चुकी है, जिसे करीब 100 फीट दूर से मूव किया जा सकता है।
- लालसिंह धानपुर, अध्यक्ष, ग्रेनाइट, एसोसिशन
Published on:
19 Jul 2018 11:38 am
