चरवाहों को खींच रही माटी की सौंधी खुश्बू

चरवाहों को खींच रही माटी की सौंधी खुश्बू
The smell of clay pulling the animal keepers

Dharmendra Ramawat | Updated: 09 Jul 2018, 11:35:52 AM (IST) Jalore, Rajasthan, India

अन्य राज्यों में जाते हैं पशु चराने, अब वतन की ओर

भेटाला (जालोर). पशु चराई के लिए अन्य प्रांतों में जाने वाले पशुपालक इन दिनों घर लौट रहे हैं।बारिश की आस में इनके घर लौटने का सिलसिला बना हुआ है। जिले के पशुपालक आमतौर पर हरियाणा, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र तक पशु चराने जाते हैं।मानसून की आहट सुनते ही घर का रूख करते हैं। मिट्टी की सौंधी खुश्बू इन्हें खींच लाती है।इन दिनों विभिन्न मार्गों एवं गांवों में पशुओं के रेवड़ लौटने के नजारे दिख रहे हैं।भेटाला क्षेत्र के मेड़ा उपरला, मेड़ा निचला, मायलावास, बारलावास, नबी, चांदना समेत कई स्थानों के पशु पालक घर लौटरहे हैं। पशुपालक समेलाराम देवासी ने बताया कि दीपावली के बाद गाय, भैंसों, ऊंटों व भेड़-बकरियों को लेकर पंजाब, हरियाणा, मालवा, गुजरात व महाराष्ट्र समेत कई स्थानों पर जाकर आसरा बना लेते हैं। गर्मी के अंतिम दिनों तक वहीं जीवनयापन करते हैं।इसके बाद जुलाई माह के करीब मारवाड़ में अच्छी बरसात की उम्मीद जगने लगती है। सैकड़ों किमी का पैदल सफर तय करते हुए गांव का रुख करते हैं।
केवल लाठी ही सहारा
राह में जहां सूर्यास्त हो जाता है वहीं बसेरा कर लेते हैं। किसी भी खुली जगह में रात गुजार कर सुबह आगे बढ़ जाते हैं।जंगली जानवरों व जहरीलें जीवों से बचने के लिए लाठी ही एकमात्र हथियार होता है। ऐसे में कई बार मुश्किलों का भी सामना करना पड़ता है।
नहीं मिल पाती सहायता
पशुपालकों ने बताया कि पैदल चलते समय जहां अंधेरा छा जाता है वहीं अस्थायी डेरा बना लेते हैं। पूरा परिवार या कई लोग साथ होने से हंसी-खुशी में समय निकल जाता है।वैसे यह गम सालता है कि रास्ते में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं में जब मवेशी काल कवलित हो जाते हैं पर सरकारी स्तर पर कोई सहायता नहीं मिल पाती।
इसलिए पशुपाालकों को जाना पड़ता है बाहर
पशुपालक बताते हैं कि गर्मी के दिनों में यहां हरियाली कम होने लगती है।इससे पशु चराई नहीं कर पाते।पर्याप्त मात्रा में चारागाह भी नहीं है। ऐसे में पशुओं को लेकर अन्य प्रांतों का रूख करते हैं। वहां मवेशियों के चरने के लिए पर्याप्त मात्रा में चारा मिल जाता है।

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