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काले सोने की खुश्बू में छिपी रह गई अपराध की दुर्गंध

अफीम के पौधे खेत में लहलहाते रहे, लेकिन अपराध की दुर्गंध संभवतया काले सोने की खुश्बू में ही छिपी रह गई, लगभग चार माह के इस पूरे समय में इस खेती से निकले अफीम का हिसाब किसी के पास नहीं है
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काले सोने की खुश्बू में छिपी रह गई अपराध की दुर्गंध

जीतेश रावल@ जालोर. मालवा और मेवाड़ में होने वाली औषधीय खेती मारवाड़ तक पहुंच गई, लेकिन अवैध रूप से। यहां इस खेती का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ नशे के सौदागरों तक पहुंचना ही था। यह अच्छा रहा कि समय रहते खेती पकड़ में आ गई अन्यथा करोड़ों रुपए मूल्य का डोडा नशे के सौदागरों तक पहुंच जाता। लगभग चार माह के इस पूरे समय में इस खेती से निकले अफीम का हिसाब किसी के पास नहीं है। लिहाजा यह भी मान सकते हैं कि करोड़ों रुपए मूल्य का अफीम नशे के रूप में खप चुका है। अपराध की दुर्गंध संभवतया काले सोने की खुश्बू में ही छिपी रह गई। यही कारण रहा कि बुवाई के बाद चीराई और फसल की कटाई तक हो गई, लेकिन खेत और खेती के बारे में किसी को भनक नहीं लगी। करीब चार माह तक अफीम के पौधे खेत में लहलहाते रहे, लेकिन तो न तो इस खेती पर किसी की नजर पड़ी और न अपराधी पकड़ में आए। गनीमत रही कि कटाई के बाद ही सही पर ऐन वक्त पर खेती का राजफाश हो गया। कुछ दिन और लग जाते तो नशे की यह पूरी खेती खत्म हो जाती और नशेडिय़ों तक खप भी जाती।

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चार माह तक लहलहाते रहे पौधे
असल में अफीम की खेती का समय अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवम्बर माह के दूसरे सप्ताह तक श्रेयस्कर माना गया है। मार्च माह के अंतिम दिनों तक खेती काट ली जाती है। जालोर जिले में मिली यह पौध इसी अवधि की है। ऐसे में इनकी बुवाई अक्टूबर-नवम्बर माह में की हो सकती है। इसके बाद चीराई का समय आने पर चीरे लगाकर अफीम भी निकाला गया। अब कटाई का समय चल रहा था। ऐसे में डोडा निकालकर बेचने की तैयारी चल रही थी।
मेवाड़-मालवा की दवा, मारवाड़ में नशा
काले सोने की खेती मुख्य रूप से मालवा व मेवाड़ क्षेत्र में की जाती है। नारकॉटिक्स विभाग की देखरेख में इसके लिए पट्टे दिए जाते हैं। इस खेती से निकलने वाला अफीम विभाग के पास जमा होता है, जो खासतौर से दवा बनाने के उपयोग में आता है। फसल के डंठल, डोडा आदि नष्ट करवा लेते हैं। यह दीगर बात है कि चोरी-छिपे कुछ अफीम व डोडा आदि तस्करों के हाथ लग जाते हैं और यहीं से तस्करी का खेल शुरू होता है। दवा के रूप में तैयार हुई फसल का यह हिस्सा नशे के रूप में इस्तेमाल होने लगता है। मारवाड़ में अफीम व डोडा सेवन करने का काफी ज्यादा चलन है।

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वहां झोंकते रहे ताकत, बगल में पैदावार
यह मुखबीर तंत्र की कमजोर रही कि करीब चार माह से चल रही इस खेती के बारे में पुलिस के पास सूचना तक नहीं थी। पुलिस बाहरी राज्यों व अन्य जिलों से आने वाले मादक पदार्थों को पकडऩे में ताकत झोंकती रही, लेकिन अपने बगल में चल रही नशे की इस खेती को लेकर जानकारी नहीं जुटा पाई। हालांकि बाहर से आने वाले मादक पदार्थों की रोकथाम भी जरूरी है, लेकिन बगल में ही वृहद स्तर पर चल रहे मामलों की अनदेखी भी तो उचित नहीं है। उल्लेखनीय है कि देवाड़ा गांव जिला मुख्यालय से करीब तीस किमी तो घासेड़ी व कोट कास्तान गांव भीनमाल के नजदीक है। इसके बावजूद इन गांवों के पास खेतों में अवैध रूप से अफीम की पैदावार होती रही।
तब खुलासा होगा...
अफीम की अवैध रूप से खेती करने के कुल छह सामने आए हैं, जिनमें जांच चल रही है। फसल पर चीरा लगाकर अफीम निकाला होगा, लेकिन कार्रवाई में अफीम हाथ नहीं लगा है। आरोपी गिरफ्त में आने पर ही खुलासा हो पाएगा।
- सत्येंद्रपाल सिंह,अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, जालोर