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भले ही यहां का कपड़ा देश-विदेश में बनाया पहचान, पर नीतियों के ताने-बाने में उलझी बुनकरों की जिंदगी

चांपा सहित कुरदा, सिवनी, सारागांव, बलौदा, उमरेली व अन्य जगहों में लगभग दस हजार बुनकर हैं, जो कई पीढ़ी से बुनकरी कर रहे हैं।

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भले ही यहां का कपड़ा देश-विदेश में बनाया पहचान, पर नीतियों के ताने-बाने में उलझी बुनकरों की जिंदगी

भले ही यहां का कपड़ा देश-विदेश में बनाया पहचान, पर नीतियों के ताने-बाने में उलझी बुनकरों की जिंदगी

जांजगीर-चांपा. कोसा कपड़े के लिए देश में प्रसिद्ध चांपा में बुनकरों की स्थिति बेहद दयनीय है। भले ही यहां का कपड़ा देश विदेश में अपनी पहचान बना चुका है, मगर इसे तैयार करने वाले बुनकरों के सामने रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो गई है। चांपा सहित कुरदा, सिवनी, सारागांव, बलौदा, उमरेली व अन्य जगहों में लगभग दस हजार बुनकर हैं, जो कई पीढ़ी से बुनकरी कर रहे हैं। ज्यादातर बुनकर मजदूर हैं। इनमें से कई लोग महाजन के यहां बुनकरी करते हैं। वहीं अन्य लोग महाजन से धागा लाकर घर में बुनकरी करते हैं। 35 मीटर के थान को बुनने के लिए इन्हें सात से दस दिन का समय लग जाता है।

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इस काम में न्यूनतम तीन लोगों की आवश्यकता होती है। प्रति मीटर इन्हें 15 से 20 रूपए मजदूरी मिलती है। इस तरह इन्हें एक थान में महज सात सौ रूपए ही मिलता है। जबकि वर्तमान में मकान बनाने वाले मजदूरों को भी प्रतिदिन सौ से डेढ़ सौ रूपए मिल जाता है। बुनकर सुरेश कुमार देवांगन अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर हैं, मगर उसे नौकरी नहीं मिली। उसने बताया कि स्थाई रोजगार नहीं मिलने के कारण वह पुश्तैनी काम को अपना लिया।

सुरेश ने बताया कि तीन पीढ़ी से वह बुनकरी कर रहा है। महाजन से धागा लाकर पत्नी व बच्चों की मदद से बुनकरी करता है। रोज आठ घंटा मेहनत करने के बाद दस दिनों में 35 मीटर का थान तैयार होता है। इसके बदले उन्हें महज सात सौ रूपए ही मिल पाता है। इस तरह प्रति सदस्य को बमुश्किल 25 से 30 रूपए ही मिलता है। खूबचंद देवांगन ने बताया कि तैयार कोसा कपड़े को फाइनल टच देने के बाद इसकी मांग देश-विदेश में है।

बाजार में प्रति मीटर कोसा कपड़ा ढाई से तीन सौ रुपए में मिलता है, जबकि जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी उनके हाथ कुछ नहीं आता। शेखर देवांगन का कहना है कि महंगाई आसमान पर पहुंच गई है मगर बुनकरी में इजाफा नहीं हुआ, जिससे बुनकर परेशान हैं।