
जांजगीर. मलेरिया जैसी जानलेवा बीमारी के प्रति स्वास्थ्य महकमा बेपरवाह है। मलेरिया से हर साल एक से दो लोगों की जान जाती है। फिर भी विभाग मलेरिया के उन्मूलन के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाती। शहरीकरण के दौर में नगर सहित जिले की आबादी तो बढ़ रही है लेकिन साफ. सफाई और स्वास्थ्य सुविधा का विस्तार नहीं हो पा रहा है।
नगर में हर ओर कचरे का ढेर है और नालियां भी जाम है। गंदगी के कारण मच्छरों को पनपने का मौका मिल रहा हैए जिससे मलेरिया का खतरा बना रहता है। गांवों में भी मलेरिया का कहर कम नहीं है। लोगों में भी इस बीमारी के प्रति जागरूकता अभाव दिखता है। बुखार होने पर सामान्यतया मलेरिया टेस्ट कराने की बजाए लोग एंटीबायोटिक दवा लेकर काम चला लेते हैं।
बीमारी बढऩे पर वे अस्पताल पहुंचते हैं, लेकिन तब तक स्थिति काफी बिगड़ चुकी होती है। तीन साल पहले मलेरिया ने जिले के कई गांवों में इस तरह कहर बरपाया की जिले भर में दो दर्जन लोगों की जान तक चली गई। जिला अस्पताल में मलेरिया के केस लगातार आने से डाक्टर हड़बड़ा गए थे।
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गांवों में भी लगातार मलेरिया के केस आने और बीमारी से हो रही मौत के बाद तो स्वास्थ्य महकमे में हडकंप मच गया था। जिले भर के 40 गांव इस बीमारी से प्रभावित हुए थे और करीब तीन सौ लोग इसकी चपेट में आए थे। पामगढ़ क्षेत्र में ही करीब आधा दर्जन लोगों की मौत हो गई थी। आनन-फानन में स्वास्थ्य विभाग द्वारा मलेरिया प्रभावित कई गांव में कैंप लगाकर इलाज किया गया।
गौर करने वाली बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी मैदानी अमले को सतर्क व जिम्मेदारी का एहसास कराने की बजाए किसी की मौत के बाद गांव में कैम्प लगा देते हैं और घटना के बाद लकीर पीटते हुए प्रशिक्षण या कार्यशाला का आयोजन किया जाता है। कार्यशाला में पहले से प्रशिक्षित विभागीय डाक्टर्स व कर्मचारियों को बचाव के उपाय बताता है जबकि इस प्रकार के कार्यशाला का आयोजन गावों में किया जाना चाहिए ताकि लोग सतर्क हो सकें।
इसके अलावा गांवों में तैनात स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को मलेरिया फैलने पर तुरंत अस्पताल में सूचना देनी चाहिए, ताकि समय रहते उपचार कर मलेरिया पीडि़त की जान बचाई जा सके।
क्या है कारण
मलेरिया मादा एनोफिलीज मच्छर के काटने से फैलता है। गंदगी और जल जमाव से शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में मच्छर पनपता है। शहरों में तो कुछ हद तक पढ़े लिखे व संपन्न लोग मच्छर से बचने के लिए आवश्यक जतन कर लेते हैं, लेकिन देहातों में मच्छर से बचाव के लिए परंपरागत धुआं के अलावा कुछ और उपयोग करने की क्षमता लोगों में नहीं रहती। इस कारण लोग जानलेवा मलेरिया के चपेट में आ जाते हैं।
मेडिकेटेड मच्छरदानी भी नहीं मिलती
सरकार द्वारा मच्छर से बचने के लिए पहले मेडिकेटेड मच्छरदानी का वितरण किया जाता थाए लेकिन अब इसे बंद कर दिया गया है। जिला मलेरिया विभाग से मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2005 में शासन की ओर से मेडिकेटेड मच्छरदानी आई थीए जिसे बांटा गया था। विभाग द्वारा अब मच्छरदानियों को टेल्ट्रामेसिन दवा से मेडिकेटेड किया जाता है। जनवरी 2011 में ये दवा आई थी जिससे मच्छरदानियों को मेडिकेटेड किया गया था। अब जून में दवा आएगी तब फिर से मच्छरदानियों को मेडिकेटेड किया जाएगा।
बचाव के उपाय
- अपने घर के आसपास जलजमाव न होने दें।
- हैंडपंप के पास किसी तरह की गंदगी न रहने दें।
- सोते समय मेडिकेटेड मच्छरदानी का उपयोग करें।
- बुखार आने पर तुरंत जांच कराकर ब्लड टेस्ट कराएं।
- हर हाल में मच्छरों को घर से दूर रखने का प्रयास करें।
मलेरिया से बचने रहें सजग
मलेरिया से बचाव के लिए गांवों में आरडी किट प्रदान किया जाता है। इसके अलावा फैल्सीफेरम दवा का वितरण किया जाता है। मलेरिया से बचाव के लिए ग्राम पंचायतों को हर साल 5 से 10 हजार रुपए प्रदान किया जाता है। ताकि मलेरिया का प्रकोप न बढ़े। घरों के आसपास साफ सफाई ही मलेरिया से बचाव के उपाय हैं- डॉ. वी जयप्रकाश, सीएमएचओ
Published on:
03 Apr 2018 05:53 pm
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