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कोलकाता के कारीगर शहर में पहुंचे गणेश की प्रतिमाओं को आकार देने लेकिन महंगाई ने तोड़ दी इनकी भी कमर

स्थानीय मूर्तिकार भी अपना जौहर दिखाने का भरपूर प्रयास करते हैं

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स्थानीय मूर्तिकार भी अपना जौहर दिखाने का भरपूर प्रयास करते हैं

स्थानीय मूर्तिकार भी अपना जौहर दिखाने का भरपूर प्रयास करते हैं

जांजगीर-चांपा. कोलकाता से आए मूर्तिकार शहर में पंडाल बनाकर गिली मिट्टी के गणेश, दुर्गा व विश्वकर्मा की प्रतिमा को आकार देने में लगे हुए हैं। शहर में मूर्ति का निर्माण करने के लिए बाहर के मूर्तिकार के अलावा स्थानीय मूर्तिकार भी अपना जौहर दिखाने का भरपूर प्रयास करते हैं। अपने तरीके से मूर्ति का निर्माण करते हैं। वे शहर में हर वर्ष मूर्ति बनाने के लिए आते हैं। उनकी मूर्तियां शहर सहित आसपास के गांव में बिकती है तो वहीं कई स्थानीय मूर्ति विक्रेता सहित गांव के छोटे मूर्तिकार भी उनकी मूर्तियों को थोक के भाव में खरीदते हैं।

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पिछले वर्ष की तुलना मेें इस वर्ष मूर्ति बनाने के लिए उपयोग में लाने वाले निर्माण सामाग्रियों के दाम बढ़ गए हैं। बांस, पैरा, मिट्टी व मजदूरी के रेट में काफी इजाफा हुआ है। जिससें इस वर्ष गणेश की मूर्तियां महंगी होगी। मूर्तिकारों को मूर्ति बनाने में लागत ज्यादा आने से मूर्तियों की कीमत में वृद्धि हुई है। जिसका सीधा असर मूर्तिकारों के व्यवसाय पर पड़ेगा, क्योंकि मूर्तियों की बिक्री पर ही उनका नफा-नुकसान तय होता है।

बांस, पैरा, मिट्टी सहित अपने साथ रखे कारीगरों को भी रोजी देनी पड़ती है। कोलकाता के मूर्तिकार निरंजनपाल ने बताया कि वे प्रतिवर्ष सीजन के दौरान शहर में रहकर मूर्ति का निर्माण करते हैं। मगर इस वर्ष जीएसटी लागू होने के चलते मूर्ति निर्माण सामाग्री की कीमत बढ़ गई है, काफी महंगे हो गए हैं।

गणेश चतुर्थी महज पंद्रह दिन ही शेष है जिसको लेकर मूर्तिकार मुर्तियों का निर्माण करने में जुटे हुए हैं लेकिन मूर्ति की कीमत में बढ़ोतरी होने के चलते मूर्तिकारों के अपेक्षा अनुरूप मूर्तियां बुकिंग नहीं हो रही है लोग मूर्ति बुकिंग कराने रूचि नहीं दिखा रहे हंै। जिससे मूर्तियों की बिक्री को लेकर मुर्तिकार काफी चिंतित हैं।


निर्माण सामाग्री की किल्लत
मूर्ति बनाने के लिए सबसे आवश्यक सामाग्री मिट्टी व पानी है। पानी की व्यवस्था तो हो जाती है लेकिन शहरीकरण के चलते मूर्तिकारों को मिट्टी के लिए भटकना पड़ता है। कुछ वर्ष पहले आसपास ही आसानी से मिट्टी उपलब्ध हो जाती थी, लेकिन अब इसके लिए दूर-दराज के खेत में जाकर मिट्टी लाना पड़ता है। जिसके लिए मूर्तिकार गर्मी केे मौसम से ही खेतों से मिट्टी ले आते हैं क्योंकि बरसात आने पर उन्हें मिट्टी लाने के लिए असुविधा का सामना करना पड़ता है।


निखार लाती है कोलकाता की मिट्टी
मूर्तिकार को मूर्ति बनाने में सबसे बड़ी कठनाई चेहरे को बनाने में होती है। मूर्तिकार बताते हैं कि मूर्ति के चहरे में निखार लाने के लिए वे कोलकाता से लाए हुए मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं। इससे मूर्ति में चमक आती है और चेहरा खिल उठता है इसलिए वह चेहरे की फिनिसिंग के लिए खासकर कोलकाता की मिट्टी का ही उपयोग करते हैं।